शुक्रवार, 21 अगस्त 2020

अष्टावक्रगीता प्रथम प्रकरण Ashtavakr geeta pratham prakaran

॥ श्रीः ॥ 


अष्टावक्रगीता


प्रथम प्रकरण


कथं ज्ञानमवाप्नोति कथं मुक्तिर्भविष्यति ।

वैराग्यं च कथं प्राप्तमेतद्ब्रूहि मम प्रभो॥१॥

वयोवृद्ध राजा जनक, बालक अष्टावक्र से पूछते हैं - हे प्रभु, ज्ञान की प्राप्ति कैसे होती है, मुक्ति कैसे प्राप्त होती है, वैराग्य कैसे प्राप्त किया जाता है, ये सब मुझे बताएं॥१॥

अष्टावक्र उवाच

मुक्तिमिच्छसिचेत्तात विषयान्विषवत्त्यज।

क्षमार्जवदयातोषसत्यं पीयूषवद्भज ॥२॥ 

श्री अष्टावक्र उत्तर देते हैं - यदि आप मुक्ति चाहते हैं तो अपने मन से विषयों (वस्तुओं के उपभोग की इच्छा) को विष की तरह त्याग दीजिये। क्षमा, सरलता, दया, संतोष तथा सत्य का अमृत की तरह सेवन कीजिये॥२॥

न पृथ्वी न जलं नाग्निर्न वायुर्द्यौर्न वा भवान् । 

एषां साक्षिणमात्मानं चिद्रूपं विद्धि मुक्तये ॥३॥

आप न पृथ्वी हैं, न जल, न अग्नि, न वायु अथवा आकाश ही हैं। मुक्ति के लिए इन तत्त्वों के साक्षी, चैतन्यरूप आत्मा को जानिए॥३॥

यदि देहं पृथक्कृत्य चिति विश्राम्य तिष्ठसि ।

अधुनैव सुखी शान्तो बंधमुक्तो भविष्यसि ॥ ४ ॥

यदि आप स्वयं को इस शरीर से अलग करके, चेतना में विश्राम करें तो तत्काल ही सुख, शांति और बंधन मुक्त अवस्था को प्राप्त होंगे॥४॥

न त्वं विप्रादि को वर्णों नाश्रमी नाक्षगोचरः।

असंगोसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव ॥५॥

आप ब्राह्मण आदि सभी जातियों अथवा ब्रह्मचर्य आदि सभी आश्रमों से परे हैं तथा आँखों से दिखाई न पड़ने वाले हैं  आप निर्लिप्त, निराकार और इस विश्व के साक्षी हैं, ऐसा जान कर सुखी हो जाएँ   

धर्माधर्मौ सुखं दुःखं मानसानि न ते विभो।

न कर्तासि न भोक्तासि मुक्त एवासि सर्वदा ॥ ६ ॥

धर्म, अधर्म, सुख, दुःख मस्तिष्क से जुड़ें हैं, सर्वव्यापक आप से नहीं। न आप करने वाले हैं और न भोगने वाले हैं, आप सदा मुक्त ही हैं 

एको द्रष्टासि सर्वस्य मुक्तप्रायोऽसि सर्वदा।

अयमेव हिते बन्धो द्रष्टारं पश्यसीतरम् ॥७॥

आप समस्त विश्व के एकमात्र दृष्टा हैं, सदा मुक्त ही हैं, आप का बंधन केवल इतना है कि आप दृष्टा किसी और को समझते हैं   

अहं कतैत्यहमानमहाकृष्णाहिदंशितः।

नाहं कर्तेति विश्वासामृतं पीत्वा सुखी भव॥८॥

अहंकार रूपी महासर्प के प्रभाववश आप 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मान लेते हैं । 'मैं कर्ता नहीं हूँ', इस विश्वास रूपी अमृत को पीकर सुखी हो जाइये   

एको विशुद्धबोधोऽहमिति निश्चयवह्निना।

प्रज्वाल्याज्ञानगहनं वीतशोकःसुखी भव॥९॥

मैं एक, विशुद्ध ज्ञान हूँ, इस निश्चय रूपी अग्नि से गहन अज्ञान वन को जला दें, इस प्रकार शोकरहित होकर सुखी हो जाएँ    

यत्र विश्वमिदं भाति कल्पितं रज्जुसर्पवत् ।

आनन्दपरमानन्दःस बोधस्त्वं सुखंचर ॥ १० ॥

 जहाँ ये विश्व रस्सी में सर्प की तरह अवास्तविक लगे, उस आनंद, परम आनंद की अनुभूति करके सुख से रहें    

                                मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्यपि ।

किंवदंतीहसत्येयं या मतिःसा गतिर्भवेत् ॥ ११ ॥

स्वयं को मुक्त मानने वाला मुक्त ही है और बद्ध मानने वाला बंधा हुआ ही है, यह कहावत सत्य ही है कि जैसी बुद्धि होती है वैसी ही गति होती है  ११  


आत्मा साक्षी विभुःपूर्णए को मुक्तश्चिदक्रियः ।

असंगोनिःस्पृहः शान्तोभ्रमात्संसारवानिव॥१२॥

 आत्मा साक्षी, सर्वव्यापी, पूर्ण, एक , मुक्त, चेतन, अक्रिय, असंग, इच्छा रहित एवं शांत है। भ्रम वश ही ये सांसारिक प्रतीत होती है  १२ 

 कूटस्थं बोधमद्वैतमात्मानं परिभावय ।

अभासोहंभ्रमंमुक्त्वाभावंबाह्यमथांतरम् ॥ १३ ॥

 अपरिवर्तनीय, चेतन व अद्वैत आत्मा का चिंतन करें और 'मैं' के भ्रम रूपी आभास से मुक्त होकर, बाह्य विश्व की अपने अन्दर ही भावना करें  १३ 

देहाभिमानपाशेन चिरंबद्दोऽसि पुत्रक।

बोधोऽहं ज्ञानखड्गेन तन्निः कृत्य सुखी भव॥१४॥

हे पुत्र! बहुत समय से आप 'मैं शरीर हूँ' इस भाव बंधन से बंधे हैं, स्वयं को अनुभव कर, ज्ञान रूपी तलवार से इस बंधन को काटकर सुखी हो जाएँ  १४  

निःसंगो निष्क्रियोऽसि तं स्वप्रकाशो निरंजनः ।

अयमेव हि ते बन्धः समाधिमनुतिष्ठसि ॥१५॥

 आप असंग, अक्रिय, स्वयं-प्रकाशवान तथा सर्वथा-दोषमुक्त हैं। आपका ध्यान द्वारा मस्तिस्क को शांत रखने का प्रयत्न ही बंधन है  १५ 

त्वया व्याप्तमिदं विश्वं त्वयि प्रोतं यथार्थतः ।

शुद्धबुद्धस्वरूपस्त्वं मा गमःक्षुद्रचित्तताम्॥१६॥

 यह विश्व तुम्हारे द्वारा व्याप्त किया हुआ है, वास्तव में तुमने इसे व्याप्त किया हुआ है । तुम शुद्ध और ज्ञानस्वरुप हो, छोटेपन की भावना से ग्रस्त मत हो    

निरपेक्षो निर्विकारो निर्भरः शीतलाशयः।

अगाधबुद्धिरक्षुब्धो भव चिन्मात्रवासनः ॥ १७॥

आप इच्छारहित, विकाररहित, घन (ठोस), शीतलता के धाम, अगाध बुद्धिमान हैं, शांत होकर केवल चैतन्य की इच्छा वाले हो जाइये  १७ 

साकारमनृतं विद्धि निराकारंतु निश्चलम्।

एतत्तत्वोपदेशेन न पुनर्भवसम्भवः॥१८॥

आकार को असत्य जानकर निराकार को ही चिर स्थायी मानिये, इस तत्त्व को समझ लेने के बाद पुनः जन्म लेना संभव नहीं है  १८ 

यथैवादर्शमध्यस्थे रूपेऽन्तः परितस्तु सः ।

तथैवास्मिन्शरीरेऽन्तः परितः परमेश्वरः१९॥

 जिस प्रकार दर्पण में प्रतिबिंबित रूप उसके अन्दर भी है और बाहर भी, उसी प्रकार परमात्मा इस शरीर के भीतर भी निवास करता है और उसके बाहर भी  १९ 

                                       एकं सर्वगतं व्योम बहिरंतर्यथा घटे।

                                   नित्यं निरन्तरं ब्रह्म सर्वभूतगणे तथा॥२०॥

जिस प्रकार एक ही आकाश पात्र के भीतर और बाहर व्याप्त है, उसी प्रकार शाश्वत और सतत परमात्मा समस्त प्राणियों में विद्यमान है  २० 

 इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां प्रथम प्रकरणं समाप्तम् ॥ १

 

धन्यवाद 

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