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शुक्रवार, 9 जून 2023

Markandeya Mahadev Story || मार्कंडेय महादेव की कहानी ! Markandey Mahadev Temple

मार्कण्डेय महादेव 



गंगा-गोमती के संगम पर स्थित 'मारकण्डेय महादेव तीर्थ धाम' इसकी अनुपम मिशाल है। उत्तर प्रदेश के वाराणसी जनपद मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर गंगा-गोमती के संगम पर चौबेपुर के कैथी ग्राम के उत्तरी सीमा पर बना 'श्रीमारकण्डेय धाम' अपार जन आस्था का प्रमुख केन्द्र है। तमाम तरह की परेशानियों से ग्रसित लोग अपने दुःखों को दूर करने के लिए यहाँ आते हैं।


         मारकण्डेय महादेव मंदिर

           (1)पुत्र प्राप्ति स्थल
तब से गंगा-गोमती के तट पर बसा 'कैथी' गाँव मारकण्डेय जी के नाम से विख्यात है। यहाँ का तपोवन काफ़ी विख्यात है। यह गर्ग, पराशर, श्रृंगी, उद्याल आदि ऋषियों की तपोस्थली रहा है। इसी स्थान पर राजा दशरथ को पुत्र प्राप्ती के लिए श्रृंगी ऋषि ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराया था, जिसके परिणाम स्वरूप राजा दशरथ को पुत्र प्राप्त हुआ था। यही वह तपोस्थली है, जहाँ राजा रघु द्वारा ग्यारह बार 'हरिवंशपुराण' का परायण करने पर उन्हें उत्तराधिकारी प्राप्त हुआ था। पुत्र कामना के लिए यह स्थल काफ़ी दुर्लभ है। 'हरिवंशपुराण' का परायण तथा 'संतान गोपाल मंत्र' का जाप कार्य सिद्धि के लिए विशेष मायने रखता है। पुत्र इच्छा पुर्ति के लिए इससे बढ़ कर सिद्धपीठ स्थान कोई दूसरा नहीं है। 'मारकण्डे महादेव' के इस तपोस्थली पर हर समय पति-पत्नि का जोड़ा पीत वस्त्र धारण कर गाठ जोड़े पुत्र प्राप्ति के लिए 'हरिवंशपुराण' का पाठ कराते हैं। इस जगह आकर पूजा-अर्चना के बाद लोगों को मनोकामना सिद्धि मिलती है।
           (2)आयु एवं आरोग्य
मार्कण्डेय महादेव की कथा अनुसार (मेरे पिछली पोस्ट देखे) यहाँ से स्वंय यमराज को हार जाना पडा । आयु एवम आरोग्य प्राप्त करने हेतु श्रद्धालु यहाँ महामृत्युंजय जप तथा पूजा-पाठ करने का पूर्ण फल प्राप्त करते है।
#markandey_mahadev 
#mahadev






धन्यवाद 

मंगलवार, 11 अगस्त 2020

तुलसीदासरचित हनुमान साठिका

 बजरंगबली हनुमान साठिका






जय जय जय हनुमान अडंगी । महावीर विक्रम बजरंगी ॥

जय कपीश जय पवन कुमारा । जय जगबन्दन सील अगारा ॥

जय आदित्य अमर अबिकारी । अरि मरदन जय-जय गिरधारी ॥

अंजनि उदर जन्म तुम लीन्हा । जय-जयकार देवतन कीन्हा ॥

बाजे दुन्दुभि गगन गम्भीरा । सुर मन हर्ष असुर मन पीरा ॥

कपि के डर गढ़ लंक सकानी । छूटे बंध देवतन जानी ॥

ऋषि समूह निकट चलि आये । पवन तनय के पद सिर नाये ॥

बार-बार अस्तुति करि नाना । निर्मल नाम धरा हनुमाना ॥

सकल ऋषिन मिलि अस मत ठाना । दीन्ह बताय लाल फल खाना ॥

सुनत बचन कपि मन हर्षाना । रवि रथ उदय लाल फल जाना ॥

रथ समेत कपि कीन्ह अहारा । सूर्य बिना भए अति अंधियारा ॥

विनय तुम्हार करै अकुलाना । तब कपीस की अस्तुति ठाना ॥

सकल लोक वृतान्त सुनावा । चतुरानन तब रवि उगिलावा ॥

कहा बहोरि सुनहु बलसीला । रामचन्द्र करिहैं बहु लीला ॥

तब तुम उन्हकर करेहू सहाई । अबहिं बसहु कानन में जाई ॥

असकहि विधि निजलोक सिधारा । मिले सखा संग पवन कुमारा ॥

खेलैं खेल महा तरु तोरैं । ढेर करैं बहु पर्वत फोरैं ॥

जेहि गिरि चरण देहि कपि धाई । गिरि समेत पातालहिं जाई ॥

कपि सुग्रीव बालि की त्रासा । निरखति रहे राम मगु आसा ॥

मिले राम तहं पवन कुमारा । अति आनन्द सप्रेम दुलारा ॥

मनि मुंदरी रघुपति सों पाई । सीता खोज चले सिरु नाई ॥

सतयोजन जलनिधि विस्तारा । अगम अपार देवतन हारा ॥

जिमि सर गोखुर सरिस कपीसा । लांघि गये कपि कहि जगदीशा ॥

सीता चरण सीस तिन्ह नाये । अजर अमर के आसिस पाये ॥

रहे दनुज उपवन रखवारी । एक से एक महाभट भारी ॥

तिन्हैं मारि पुनि कहेउ कपीसा । दहेउ लंक कोप्यो भुज बीसा ॥

सिया बोध दै पुनि फिर आये । रामचन्द्र के पद सिर नाये।
मेरु उपारि आप छिन माहीं । बांधे सेतु निमिष इक मांहीं ॥

लछमन शक्ति लागी उर जबहीं । राम बुलाय कहा पुनि तबहीं ॥

भवन समेत सुषेन लै आये । तुरत सजीवन को पुनि धाये ॥

मग महं कालनेमि कहं मारा । अमित सुभट निसिचर संहारा ॥

आनि संजीवन गिरि समेता । धरि दीन्हों जहं कृपा निकेता ॥

फनपति केर सोक हरि लीन्हा । वर्षि सुमन सुर जय जय कीन्हा ॥

अहिरावण हरि अनुज समेता । लै गयो तहां पाताल निकेता ॥

जहां रहे देवि अस्थाना । दीन चहै बलि काढ़ि कृपाना ॥

पवनतनय प्रभु कीन गुहारी । कटक समेत निसाचर मारी ॥

रीछ कीसपति सबै बहोरी । राम लषन कीने यक ठोरी ॥

सब देवतन की बन्दि छुड़ाये । सो कीरति मुनि नारद गाये ॥

अछयकुमार दनुज बलवाना । कालकेतु कहं सब जग जाना ॥

कुम्भकरण रावण का भाई । ताहि निपात कीन्ह कपिराई ॥

मेघनाद पर शक्ति मारा । पवन तनय तब सो बरियारा ॥

रहा तनय नारान्तक जाना । पल में हते ताहि हनुमाना ॥

जहं लगि भान दनुज कर पावा । पवन तनय सब मारि नसावा।
जय मारुत सुत जय अनुकूला । नाम कृसानु सोक सम तूला ॥

जहं जीवन के संकट होई । रवि तम सम सो संकट खोई ॥

बन्दि परै सुमिरै हनुमाना । संकट कटै धरै जो ध्याना ॥

जाको बांध बामपद दीन्हा । मारुत सुत व्याकुल बहु कीन्हा ॥

सो भुजबल का कीन कृपाला । अच्छत तुम्हें मोर यह हाला ॥

आरत हरन नाम हनुमाना । सादर सुरपति कीन बखाना ॥

संकट रहै न एक रती को । ध्यान धरै हनुमान जती को ॥

धावहु देखि दीनता मोरी । कहौं पवनसुत जुगकर जोरी ॥

कपिपति बेगि अनुग्रह करहु । आतुर आइ दुसै दुख हरहु ॥

राम सपथ मैं तुमहिं सुनाया । जवन गुहार लाग सिय जाया ॥

यश तुम्हार सकल जग जाना । भव बन्धन भंजन हनुमाना ॥

यह बन्धन कर केतिक बाता । नाम तुम्हार जगत सुखदाता ॥

करौ कृपा जय जय जग स्वामी । बार अनेक नमामि नमामी ॥

भौमवार कर होम विधाना । धूप दीप नैवेद्य सुजाना ॥

मंगल दायक को लौ लावे । सुन नर मुनि वांछित फल पावे ॥

जयति जयति जय जय जग स्वामी । समरथ पुरुष सुअन्तरजामी ॥

अंजनि तनय नाम हनुमाना । सो तुलसी के प्राण समाना ॥

। दोहा ।
जय कपीस सुग्रीव तुम, जय अंगद हनुमान ॥

राम लषन सीता सहित, सदा करो कल्याण ॥

बन्दौं हनुमत नाम यह, भौमवार परमान ॥

ध्यान धरै नर निश्चय, पावै पद कल्याण ॥

जो नित पढ़ै यह साठिका, तुलसी कहैं बिचारि ।
रहै न संकट ताहि को, साक्षी हैं त्रिपुरारि ॥

। सवैया ।
आरत बन पुकारत हौं कपिनाथ सुनो विनती मम भारी ।
अंगद औ नल-नील महाबलि देव सदा बल की बलिहारी ॥

जाम्बवन्त् सुग्रीव पवन-सुत दिबिद मयंद महा भटभारी ।
दुःख दोष हरो तुलसी जन-को श्री द्वादश बीरन की बलिहारी ॥

ॐगोस्वामीतुलसीदासरचित हनुमान साठिकाૐ

सोमवार, 20 जुलाई 2020

मृत्यु सूचक लक्षण


मृत्यु के निकट आने पर जो चिन्ह /लक्षण प्रकट होते है। 

  • जिसके मल मूत्र और वीर्य या मल मूत्र एवं छींक एक साथ ही गिरते है ,उसकी आयु केवल एक वर्ष और शेष है यानि वह एक वर्ष उपरांत मृत्यु को प्राप्त होगा। 
  • जो इंद्रनीलमणि के समान रंगवाले नागों के झुण्ड को आकाश में फैला हुआ देखता है ,वह छः महीने भी जीवित नहीं रहता। 
  • जिसकी मृत्यु निकट है वह ध्रूव (तारा )को भी नहीं देख पाता। 
  • जो अकस्मात रंगो और स्वादो  के विपरीत रूप से देखने और अनुभव करने लगता है वह केवल छः महीने में मृत्यु को प्राप्त होता। 
  • वीर्य ,नख, और आँखो का कोना ये सब यदि नील या काले रंग के हो जाये तो मनुष्य छः महीने के अंदर ही में मृत्यु को प्राप्त होगा। 
  • अच्छी तरह स्न्नान करने के उपरांत भी अगर जिनका ह्रदय शीघ्र ही सूख जाता है तथा हाथ और पैर भी जल्दी सूख जाते है तो उनका जीवन केवल तीन महीने ही चलता हैं। 
  • जो मनुष्य जल ,घी ,और दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब नहीं देख पाता वह केवल एक मास /महीने ही जीवित रहता है। 
  • बुद्धि भ्रष्ट हो जाये ,वाणी स्पष्ट न निकले ,रात में इंद्रधनुष का दर्शन हो ,दो चन्द्रमा और दो सूर्य दिखायी दे तो यह मृत्यु सूचक है। 
  • कान बंद कर लेने के बाद कोई भी आवाज न सुनायी दे तथा मोटा शरीर थोड़े ही दिनों में पतला एवं दुबला -पतला शरीर मोटा हो जाये तो उसकी एक महीने में मृत्यु हो जाती है। 
  • जिसे स्वप्न में भूत ,प्रेत ,पिशाच ,असुर ,कौए,कुत्ते,गिद्ध सियार ,गधे और सूअर इधर -उधर ले जाते है और खाते है वह वर्ष के अंत में प्राणांत हो जाता हैं। 
  • जो स्वप्न में अपने को गन्ध पुष्प और लाल वस्त्रो से विभूषित देखता है ,वह उस दिन से केवल आठ महीने ही जीवित रहता है। 
  • जो स्वप्न में अपने को तेल लगाये ,मूड़ मुड़ाये और गदहे पर चढ़े दक्षिण दिशा की ओर ले जाये जाते देखता है तो उसकी छः महीने में हो जाती है। 
  • जो मनुष्य स्वप्न में बानर की सवारी पर चढ़कर पूर्व दिशा की ओर जाता है ,वह पाँच ही दिन में मृत्यु  प्राप्त होता है। 
  • जो स्वप्न में लोहे का डंडा और काला वस्त्र धारण करने वाला किसी काले रंग के पुरुष को अपने आगे खड़े देखता है। 
  • Whose stool urine and semen or stool urine and sneeze fall together, his age is only one year and the rest means that he will die after one year.
  • One who sees a flock of serpents of color like INDRNILMANI spreads in the sky, he does not live even for six months.
  • The one who is near death cannot even see the DHURVA (star).
  • One who suddenly begins to see and experience the opposite of colors and tastes would have died in only six months.
  • If all of these semen, nails, and eyes are turned into indigo or black color, then a person will die within six months.
  • Even after drinking well, if the heart dries up quickly and the hands and feet also dry quickly, then their life only lasts for three months.
  • A person who cannot see his image in water, ghee, and mirror lives only one month / month.
  • Wisdom should be corrupted, speech should not be clear, rainbow should be seen at night, if two moons and two suns are visible then it is a sign of death.
  • After closing the ears, no sound is heard and if the fat body becomes thin and lean and fat in a few days, then it dies in a month.
  • The one whom ghosts, ghosts, vampires, asuras, crows, dogs, vulture jackals, donkeys and pigs carry and eat in their dreams, dies at the end of the year.
  • One who sees himself in a dream adorned with smells of flowers and red clothes, lives only eight months from that day.
  • In a dream, if you see yourself applying oil, turning your head and moving on the donkey towards south direction, then it is done in six months.
  • In a dream, a person who goes on the ride of the monkey and goes towards the east, dies in five days.
  • Who sees in the dream a black man wearing an iron stick and a black robe standing in front of him.

शनिवार, 18 जुलाई 2020

मोक्षदायनी काशी




वाराणसी (काशी )



मोक्षदायनी काशी एवं गँगा 




 काशी ,वाराणसी ,बनारस भारत  ही नहीं अपितु संसार के प्राचीनतम नगरों में से एक हैं। यह वरुणा एवं अस्सी दो नदियों से मिलकर बना है। 
                                     वर्त्तमान काशी में दर्शनीय मंदिर बाबा विश्वनाथ ,माँ अन्नपूर्णा ,श्री मार्कण्डेय महादेव ,बाबा भैरवनाथ ,संकटमोचन ,दुर्गा कुण्ड ,तुलसी मंदिर ,BHU विश्वनाथ ,आदि विश्वेश्वर ,साक्षी विनायक ,पांच रत्न आदि। 
कुण्डो तथा वापियों में दुर्गा कुण्ड ,पुष्कर कुण्ड ,पिशाचमोचन ,कपिलधारा ,लोलार्क,मानसरोवर तथा मन्दाकिनी आदि प्रमुख है। काशी घाटों के लिए विख्यात है और बनारस में अनेको घाट है। उनमें से अस्सी ,दशाश्वमेध ,हरिश्चंद्र 
मणिकर्णिका ,अहिल्या,आदि प्रसिद्ध घाट हैं। 

रविवार, 24 सितंबर 2017

नवरात्र विशेष

                                                                      नवरात्र विशेष 





                                                         शक्तिपीठ - दर्शन

          भारत वर्ष में शक्ति साधना के कुछ विशिष्ट स्थल है जो शक्ति पीठ के नाम से जाना जाता है | अध्यात्म की खोज में लगे लोग एक न एक बार अवश्य ही इन शक्ति पीठो का दर्शन करता है |पौराणिक आख्यानो के अनुसार दक्षप्रजापति के यज्ञ में भगवान शंकर को आमंत्रित न करने के कारण भगवती सती यज्ञ में अपने शरीर का परित्याग करके यज्ञ- विध्वंस कर दिया | भगवान शंकर सतीक की देह को अपने कंधे पर रखकर नृत्य करते हुए पृथ्वी पर भ्रमण करने लगे | पराम्बा भगवती के चिन्मय अंग ५१ स्थानों पर गिरे | उनमे २१ प्रमुख शक्तिपीठ

  1. काशी का श्री विशालाक्षी शक्तिपीठ
  2. कामरूप  नीलांचल कामख्या शक्ति पीठ 
  3. कन्याकुमारी शक्तिपीठ
  4. कुरुक्षेत्र भद्रकाली शक्तिपीठ  
  5. पश्चिम तिब्बत स्थित शक्तिपीठ 
  6. आद्याशक्ति और नेपालशक्तिपीठ-गुहोश्र्वोरीदेवी
  7. माँ कल्याणी (ललिता ) शक्तिपीठ -प्रयाग 
  8. क्षीर ग्राम शक्तिपीठ 
  9. करतोयातट  शक्तिपीठ 
  10. कात्यायनी शक्तिपीठ 
  11. चामुण्डा मथुरा शक्तिपीठ 
  12. आरासुरी अम्बाजी शक्तिपीठ -गुजरात 
  13. ज्वालाजी शक्तिपीठ -हिमाचल 
  14. महामाया पाटेश्वरी शक्तिपीठ-देवीपाटन 
  15. श्रीसिध्द्पीठ माता हरसिध्द मंदिर -उज्जैन 
  16. श्रीमाता त्रिपुरेश्वेरी शक्तिपीठ -त्रिपुरा 
  17. हृदयपीठ-वैद्यनाथधाम 
  18. श्रीभद्र्कालिदेवी शक्तिपीठ -जनस्थान (नासिक )
  19. उत्कल देश शक्तिपीठ -विरजा और विमला 
  20. माँ तारा चंडी शक्तिपीठ-सासाराम 
  21. करवीर शक्तिपीठ -कोल्हापुर 



धन्यवाद 


मंगलवार, 12 सितंबर 2017

पितृ-सूक्त का महत्त

पितृ-सूक्त का महत्त


आज के समय में ‘पितृ-दोष’ लगातार फैलता जा रहा है। किसी के घर में ‘पितृ-दोष’ है, तो कहीं किसी की ‘जन्म-कुण्ड़ली’ में ‘पितृ-दोष’ पाया जाता है। इसका सबसे बड़ा कारण तो यह है कि ‘कुल-पुरोहित’ का न होना। दो, तीन दशक पहले तक सभी घरों के अपने-अपने ‘कुल-पुरोहित’ होते थे और आम व्यक्ति अपने पितरों के निमित्त जो भी श्राद्ध या दान करते थे, उसमें ‘कुल-पुरोहित’ प्रधान होता था, किन्तु समय के साथ-साथ जहाँ बहुत कुछ बदला, वहीं ‘कुल-पुरोहित’ परम्परा भी लुप्त सी हो गई है। गिने-चुने घरों में ही ‘कुल-पुरोहित’ बचे हुऐ हैं। अधिकतर व्यक्ति ‘पितृ-पूजा’ छोड़ चुके हैं। कुछ व्यक्ति पितरों के नाम पर इधर-उधर दान करते है, जिससे कि उन्हे थोड़ा-बहुत फायदा तो होता है, किन्तु सम्पूर्ण रूप से लाभ नहीं मिल पाता। ‘पितर-दोष’ से परेशान व्यक्ति उपाय हेतु जब किसी के भी पास जाता है, तो अधिकतर पंडित-पुरोहित ‘पूरे-परिवार’ (खानदान) को मिलकर ‘पितर-दोष निवारण पूजा’ करने को कहतें हैं, या फिर ‘गया-श्राद्ध’ करने को कहते हैं। आज का समय ऐसा हो गया है कि सम्पूर्ण परिवार पूजा के नाम पर एकत्रित होना मुश्किल है। ‘गया-श्राद्ध’ भी सभी व्यक्ति नहीं करा पाते। कुछ लोग जो ‘गया-श्राद्ध’ करवाते भी हैं, तो सम्पूर्ण नियमों का प्रयोग नहीं करते। जिससे कि उन्हें वो फायदा नहीं मिलता जो कि उन्हें मिलना चाहिये।

‘पितर-दोष निवारण’ की सबसे प्राचीन एवं श्रेष्ठ पद्धति ‘नारायणबलि’ है। ‘नारायणबलि को आज के समय में सही ढ़ंग से करने एवं कराने वाले भी बहुत ही कम ‘पंड़ित’ रह गये है। हमने अपने वर्षो के अनुसन्धान में ‘पितृ-सूक्त’ को ‘पितर-दोष’ का श्रेष्ठ उपाय के रूप में पाया। जो साधक ‘एकादशी’ या ‘अमावस्या’ के दिन, ‘पितृ-पक्ष’ में, या प्रतिदिन ‘पितृ-सूक्त’ का पाठ करता है, उसके ‘घर’ में या ‘जन्म-कुण्ड़ली’ में कैसा भी ‘पितृ-दोष’ क्यों न हो, हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है और ‘पितरों’ की असीम-कृपा ‘साधक और उसके परिवार’ पर हो जाती है। ‘स्कंद-पुराण’ के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जाति के अनुसार अपने पितरों के निमित्त दान एवं श्राद्ध करना चाहिये। ब्राह्मणों के पितर ‘ॠषि वसिष्ठ’ के पुत्र माने गये हैं, अतः ब्राह्मणों को उनकी पूजा करनी चाहिये। क्षत्रियों के पितर ‘अंगिरस- ॠषि’ के पुत्र माने गये है, अतः क्षत्रियों को उनकी पूजा करनी चाहिये। वैश्यों को ‘पुलह-ऋषि’ के पुत्रों की पितर रूप में पूजा करनी चाहिये। शुद्रों को ‘हिरण्यगर्भ’ के पुत्रों की पितर रूप में पूजा करनी चाहिये। प्रत्येक व्यक्ति अपने पितरों के निमित्त जो भी दान या श्राद्ध करें, उस वक्त यदि वह ‘पितृ-सूक्त’ का पाठ करेंगे, तो उनकी सभी मनोकामनायें पूर्ण हों जाऐंगी।

ॐ ॐ॥ पितर कवचः ॥ ॐ ॐ

कृणुष्व पाजः प्रसितिम् न पृथ्वीम् याही राजेव अमवान् इभेन ।
तृष्वीम् अनु प्रसितिम् द्रूणानो अस्ता असि विध्य रक्षसः तपिष्ठैः ॥


तव भ्रमासऽ आशुया पतन्त्यनु स्पृश धृषता शोशुचानः ।
तपूंष्यग्ने जुह्वा पतंगान् सन्दितो विसृज विष्व-गुल्काः ॥


प्रति स्पशो विसृज तूर्णितमो भवा पायु-र्विशोऽ अस्या अदब्धः ।
यो ना दूरेऽ अघशंसो योऽ अन्त्यग्ने माकिष्टे व्यथिरा दधर्षीत् ॥


उदग्ने तिष्ठ प्रत्या-तनुष्व न्यमित्रान् ऽओषतात् तिग्महेते ।
यो नोऽ अरातिम् समिधान चक्रे नीचा तं धक्ष्यत सं न शुष्कम् ॥


ऊर्ध्वो भव प्रति विध्याधि अस्मत् आविः कृणुष्व दैव्यान्यग्ने ।
अव स्थिरा तनुहि यातु-जूनाम् जामिम् अजामिम् प्रमृणीहि शत्रून् ।
अग्नेष्ट्वा तेजसा सादयामि॥

 ऋग्वेद के अंतर्गत 

         ॥ पितृ-सूक्तम् ॥

उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः ।

असुं य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु ॥०१


नीचे, ऊपर और मध्यस्थानोंमे रहनेवाले, सोमपान करनेके योग्य हमारे सभी पितर उठकर तैयार हों । यज्ञके ज्ञाता सौम्य स्वभावके हमारे जिन पितरोंने नूतन प्राण धारण कर लिये हैं, वे सभी हमारे बुलानेपर आकर हमारी सुरक्षा करें 


इदं पितृभ्यो नमो अस्त्वद्य ये पूर्वासो य उपरास ईयुः ।

ये पार्थिवे रजस्या निषत्ता ये वा नूनं सुवृजनासु विक्षु ॥०२


जो भी नये अथवा पुराने पितर यहॉंसे चले गये हैं, जो पितर अन्य स्थानोंमें हैं और जो उत्तम स्वजनोंके साथ निवास कर रहे हैं अर्थात् यमलोक, मर्त्यलोक और विष्णुलोकमें स्थित सभी पितरोंको आज हमारा यह प्रणाम निवेदित हो 


आहं पितॄन्सुविदत्राँ अवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः ।

बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वस्त इहागमिष्ठाः ॥०३


उत्तम ज्ञानसे युक्त पितरोंको तथा अपांनपात् और विष्णुके  विक्रमणको, मैंने अपने अनुकूल बना लिया है । कुशासनपर बैठनेके अधिकारी पितर प्रसन्नापूर्वक आकर अपनी इच्छाके अनुसार हमारे-द्वारा अर्पित हवि और सोमरस ग्रहण करें 


बर्हिषदः पितर ऊत्य१र्वागिमा वो हव्या चकृमा जुषध्वम् ।

त आ गतावसा शंतमेनाथा नः शं योररपो दधात ॥०४


कुशासनपर अधिष्ठित होनेवाले हे पितर ! आप कृपा करके  हमारी ओर आइये । यह हवि आपके लिये ही तैयार की गयी है, इसे प्रेमसे स्वीकार कीजिये । अपने अत्यधिक सुखप्रद प्रसादके साथ आयें और हमें क्लेशरहित सुख तथा कल्याण प्राप्त करायें 



उपहूताः पितरः सोम्यासो बर्हिष्येषु निधिषु प्रियेषु ।

त आ गमन्तु त इह श्रुवन्त्वधि ब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान् ॥०५


पितरोंको प्रिय लगनेवाली सोमरुपी निधियोंकी स्थापनाके बाद कुशासनपर हमने पितरोंको आवाहन किया है । वे यहॉं आ जायँ और हमारी प्रार्थना सुनें । वे हमारी सुरक्षा करनेके साथ ही देवोंके पास हमारी ओर से संस्तुति करें


आच्या जानु दक्षिणतो निषद्येमं यज्ञमभि गृणीत विश्वे ।

मा हिंसिष्ट पितरः केन चिन्नो यद्व आगः पुरुषता कराम ॥०६


हे पितरो ! बायॉं घुटना मोडकर और वेदीके दक्षिणमें नीचे बैठकर आप सभी हमारे इस यज्ञकी प्रशंसा करें । मानव-स्वभावके अनुसार हमने आपके विरुद्ध कोई भी अपराध किया होतो उसके कारण हे पितरो, आप हमें दण्ड मत दें ( पितर बायॉं घुटना मोडकर बैठते हैं और देवता दाहिना घुटना मोडकर बैठना पसन्द करते हैं )


आसीनासो अरुणीनामुपस्थे रयिं धत्त दाशुषे मर्त्याय ।

पुत्रेभ्यः पितरस्तस्य वस्वः प्र यच्छत त इहोर्जं दधात ॥०७


अरुणवर्णकी उषादेवीके अङ्कमें विराजित हे पितर ! अपने इस मर्त्यलोकके याजकको धन दें, सामर्थ्य दें तथा अपनी प्रसिद्ध सम्पत्तिमेंसे कुछ अंश हम पुत्रोंको देवें 


ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासोऽनूहिरे सोमपीथं वसिष्ठाः ।

तेभिर्यमः संरराणो हवींष्युशन्नुशद्भिः प्रतिकाममत्तु ॥०८


सोमपानके योग्य हमारे वसिष्ठ कुलके सोमपायी पितर यहॉं उपस्थित हो गये हैं । वे हमें उपकृत करनेके लिये सहमत होकर और स्वयं उत्कण्ठित होकर यह राजा यम हमारे-द्वारा समर्पित हविको अपनी इच्छानुसार ग्रहण करें

ये तातृषुर्देवत्रा जेहमाना होत्राविदः स्तोमतष्टासो अर्कैः ।

आग्ने याहि सुविदत्रेभिरर्वाङ्सत्यैः कव्यैः पितृभिर्घर्मसद्भिः ॥०९


अनेक प्रकारके हवि-द्रव्योंके ज्ञानी अर्कोंसे, स्तोमोंकी सहायतासे जिन्हें निर्माण किया है, ऐसे उत्तम ज्ञानी, विश्र्वासपात्र घर्म नामक हविके पास बैठनेवाले ' कव्य ' नामक हमारे पितर देवलोकमें सॉंस लगनेकी अवस्थातक प्याससे व्याकुल हो गये हैं । उनको साथ लेकर हे अग्निदेव ! आप यहॉं उपस्थित होवें 


ये सत्यासो हविरदो हविष्पा इन्द्रेण देवैः सरथं दधानाः ।

आग्ने याहि सहस्रं देववन्दैः परैः पूर्वैः पितृभिर्घर्मसद्भिः ॥ १०


 कभी न बिछुडनेवाले, ठोस हविका भक्षण करनेवाले, द्रव हविका पान करनेवाले, इन्द्र और अन्य देवोंके साथ एक ही रथमें प्रयाण करनेवाले, देवोंकी वन्दना करनेवाले, घर्म नामक हविके पास बैठनेवाले जो हमारे पूर्वज पितर हैं, उन्हें सहस्त्रोंकी संख्यामें लेकर हे अग्निदेव ! यहॉं पधारें 


अग्निष्वात्ताः पितर एह गच्छत सदःसदः सदत सुप्रणीतयः ।

अत्ता हवींषि प्रयतानि बर्हिष्यथा रयिं सर्ववीरं दधातन ॥११


अग्निके द्वारा पवित्र किये गये हे उत्तमपथ प्रदर्शक पितर ! यहॉं आइये और अपने-अपने आसनोंपर अधिष्ठित हो जाइये । कुशासनपर समर्पित हविर्द्रव्योंका भक्षण करें और ( अनुग्रहस्वरुप ) पुत्रोंसे युक्त सम्पदा हमें समर्पित करा दें


त्वमग्न ईळितो जातवेदोऽवाड्ढव्यानि सुरभीणि कृत्वी ।

प्रादाः पितृभ्यः स्वधया ते अक्षन्नद्धि त्वं देव प्रयता हवींषि ॥१२


 हे ज्ञानी अग्निदेव ! हमारी प्रार्थनापर आप इस हविको मधुर बनाकर पितरोंने भी अपनी इच्छाके अनुसार उस हविका भक्षण किया । हे अग्निदेव ! ( अब हमारे-द्वारा ) समर्पित हविको आप भी ग्रहण करें 


ये चेह पितरो ये च नेह याँश्च विद्म याँ उ च न प्रविद्म ।

त्वं वेत्थ यति ते जातवेदः स्वधाभिर्यज्ञं सुकृतं जुषस्व ॥१३


जो हमारे पितर यहॉं ( आ गये ) हैं और जो यहॉं नही आये हैं, जिन्हें हम जानते हैं और जिन्हें हम अच्छी प्रकार जानते भी नहीं; उन सभीको, जितने ( और जैसे ) हैं, उन सभीको हे अग्निदेव ! आप भलीभॉंति पहचानते हैं । उन सभीकी इच्छाके अनुसार अच्छी प्रकार तैयार किये गये इस हविको ( उन सभीके लिये ) प्रसन्नताके साथ स्वीकार करें 


ये अग्निदग्धा ये अनग्निदग्धा मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते ।

तेभिः स्वराळसुनीतिमेतां यथावशं तन्वं कल्पयस्व ॥१४


 हमारे जिन पितरोंको अग्निने पावन किया है और जो अग्निद्वारा भस्मसात] किये बिना ही स्वयं पितृभूत हैं तथा जो अपनी इच्छाके अनुसार स्वर्गके मध्यमें आनन्दसे निवास करते हैं । उन सभीकी अनुमतिसे, हे स्वराट् अग्ने ! ( पितृलोकमें इस नूतन मृतजीवके ) प्राण धारण करने योग्य ( उसके ) इस शरीरको उसकी इच्छाके अनुसार ही बना दो और उसे दे दो




धन्यवाद 

शनिवार, 9 सितंबर 2017

Shiv Panch akshar Mantra || शिव पंचाक्षर मंत्र स्त्रोत ! Stotra

         

    

  शिव पंचाक्षर स्तोत्र

श्रीशिव पंचाक्षर स्तोत्र के पाँचों श्लोकों में क्रमशः न, म, शि, वा और य अर्थात् ‘नम: शिवाय’ है, अत: यह स्तोत्र शिवस्वरूप है–

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांगरागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै ‘न’काराय नम: शिवाय।।
मन्दाकिनी सलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय।
मन्दारपुष्पबहुपुष्प सुपूजिताय तस्मै ‘म’काराय नम: शिवाय।
शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै ‘शि’काराय नम: शिवाय।।
वशिष्ठकुम्भोद्भव गौतमार्य मुनीन्द्रदेवार्चित शेखराय।
चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय तस्मै ‘व’काराय नम: शिवाय।।
यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै ‘य’काराय नम: शिवाय।।
पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेत् शिव सन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥

अर्थ–’

जिनके कण्ठ में सांपों का हार है, जिनके तीन नेत्र हैं, भस्म जिनका अंगराग है और दिशाएं ही जिनका वस्त्र है (अर्थात् जो नग्न है), उन शुद्ध अविनाशी महेश्वर ‘न’कारस्वरूप शिव को नमस्कार है। गंगाजल और चंदन से जिनकी अर्चा हुई है, मन्दार-पुष्प तथा अन्य पुष्पों से जिनकी सुन्दर पूजा हुई है, उन नन्दी के अधिपति, प्रमथगणों के स्वामी महेश्वर ‘म’कारस्वरूप शिव को नमस्कार है। जो कल्याणरूप हैं, पार्वतीजी के मुखकमल को प्रसन्न करने के लिए जो सूर्यस्वरूप हैं, जो दक्ष के यज्ञ का नाश करने वाले हैं, जिनकी ध्वजा में बैल का चिह्न है, उन शोभाशाली नीलकण्ठ ‘शि’कारस्वरूप शिव को नमस्कार है। वशिष्ठ, अगस्त्य और गौतम आदि मुनियों ने तथा इन्द्र आदि देवताओं ने जिनके मस्तक की पूजा की है, चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि जिनके नेत्र हैं, उन ‘व’कारस्वरूप शिव को नमस्कार है। जिन्होंने यक्षरूप धारण किया है, जो जटाधारी हैं, जिनके हाथ में पिनाक है, जो दिव्य सनातन पुरुष हैं, उन दिगम्बर देव ‘य’कारस्वरूप शिव को नमस्कार है। जो शिव के समीप इस पवित्र पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ करता है, वह शिवलोक को प्राप्त होता है और वहां शिवजी के साथ आनन्दित होता है।

  विभिन्न कामनाओं के लिए पंचाक्षर मन्त्र का प्रयोग

विभिन्न कामनाओं के लिए गुरु से मन्त्रज्ञान प्राप्त करके नित्य इसका ससंकल्प जप करना चाहिए और पुरश्चरण भी करना चाहिए।

–दीर्घायु चाहने वाला गंगा आदि नदियों पर पंचाक्षर मन्त्र का एक लाख जप करे व दुर्वांकुरों, तिल व गिलोय का दस हजार हवन करे।
–अकालमृत्यु भय को दूर करने के लिए शनिवार को पीपलवृक्ष का स्पर्श करके पंचाक्षर मन्त्र का जप करे।
–चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण के समय एकाग्रचित्त होकर महादेवजी के समीप दस हजार जप करता है, उसकी सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं।
–विद्या और लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए अंजलि में जल लेकर शिव का ध्यान करते हुए ग्यारह बार पंचाक्षर मन्त्र का जप करके उस जल से शिवजी का अभिषेक करना चाहिए।
–एक सौ आठ बार पंचाक्षर मन्त्र का जप करके स्नान करने से सभी तीर्थों में स्नान का फल मिलता है।
–प्रतिदिन एक सौ आठ बार पंचाक्षर मन्त्र का जप करके सूर्य के समक्ष जल पीने से सभी उदर रोगों का नाश हो जाता है।
–भोजन से पूर्व ग्यारह बार पंचाक्षर मन्त्र के जप से भोजन भी अमृत के समान हो जाता है।
–रोग शान्ति के लिए पंचाक्षर मन्त्र का एक लाख जप करें और नित्य १०८ आक की समिधा से हवन करें।

शिव’ नामरूपी मणि जिसके कण्ठ में सदा विराजमान रहती है, वह नीलकण्ठ का ही स्वरूप बन जाता है। शिव नाम रूपी कुल्हाड़ी से संसाररूपी वृक्ष जब एक बार कट जाता है तो वह फिर दोबारा नहीं जमता। भगवान शंकर पार्वतीजी से कहते हैं कि कलिकाल में मेरी पंचाक्षरी विद्या का आश्रय लेने से मनुष्य संसार-बंधन से मुक्त हो जाता है। मैंने बारम्बार प्रतिज्ञापूर्वक यह बात कही है कि यदि पतित, निर्दयी, कुटिल, पातकी मनुष्य भी मुझमें मन लगा कर मेरे पंचाक्षर मन्त्र का जप करेंगे तो वह उनको संसार-भय से तारने वाला होगा।

भगवान शिव हैं बड़े ‘आशुतोष’। उपासना करने वालों पर वे बहुत शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं फिर जो निष्कामभाव से प्रेमपूर्वक उनको भजते हैं, उनका तो कहना ही क्या? तुलसीदासजी ने कहा है–

भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ।
नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ।।

ॐ नमः शिवाय   शिव पंचाक्षर स्तोत्र           

 ! ॐ नमः शिवाय !

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

Markandey Mahadev Story

       मार्कण्डेय महादेव तीर्थ स्थल











मृगश्रृंग नाम के एक ब्रह्मचारी थे। उनका विवाह सुवृता के संग संपन्न हुआ। मृगश्रृंग और सुवृता के घर एक पुत्र ने जन्म लिया। उनके पुत्र हमेशा अपना शरीर खुजलाते रहते थे। इसलिए मृगश्रृंग ने उनका नाम मृकण्डु रख दिया। मृकण्डु में समस्त श्रेष्ठ गुण थे। उनके शरीर में तेज का वास था।पिता के पास रह कर उन्होंने वेदों के अध्ययन किया। पिता कि आज्ञा अनुसार उन्होंने मृदगुल मुनि की कन्या मरुद्वती से विवाह किया।
        मार्कण्डेय ऋषि का जन्म
मृकण्डु जी का वैवाहिक जीवन शांतिपूर्ण ढंग से व्यतीत हो रहा था। लेकिन बहुत समय तक उनके घर किसी संतान ने जन्म ना लिया। इस कारण उन्होंने और उनकी पत्नी ने कठोर तप किया। उन्होंने तप कर के भगवन शिव को प्रसन्न कर लिया। भगवान् शिव ने मुनि से कहा कि,
“हे मुनि, हम तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हैं मांगो क्या वरदान मांगते हो”?
तब मुनि मृकण्डु ने कहा,
“प्रभु यदि आप सच में मेरी तपस्या से प्रसन्न हैं तो मुझे संतान के रूप में एक पुत्र प्रदान करें”।
भगवन शंकर ने तब मुनि मृकण्डु से कहा की,
“हे मुनि, तुम्हें दीर्घ आयु वाला गुणरहित पुत्र चाहिए। या सोलह वर्ष की आयु वाला गुणवान पुत्र चाहते हो?”
इस पर मुनि बोले,
“भगवन मुझे ऐसा पुत्र चाहिए जो गुणों कि खान हो और हर प्रकार का ज्ञान रखता हो फिर चाहे उसकी आयु कम ही क्यों न हो।”
भगवान् शंकर ने उनको पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद दिया और अंतर्ध्यान हो गए। समय आने पर महामुनि मृकण्डु और मरुद्वती के घर एक बालक ने जन्म लिया जो आगे चलकर  मार्कण्डेय ऋषि के नाम से प्रसिद्द हुआ।
महामुनि मृकण्डु ने मार्कण्डेय को हर प्रकार की शिक्षा दी। महर्षि मार्कण्डेय एक आज्ञाकारी पुत्र थे। माता-पिता के साथ रहते हुए पंद्रह साल बीत गए। जब सोलहवां साल आरम्भ हुआ तो माता-पिता उदास रहने लगे। पुत्र ने कई बार उनसे उनकी उदासी का कारण जानने का प्रयास किया। एक दिन महर्षि मार्कण्डेय ने बहुत जिद की तो महामुनि मृकण्डु ने बताया कि भगवन शंकर ने तुम्हें मात्र सोलह वर्ष की आयु दी है और यह पूर्ण होने वाली है। इस कारण मुझे शोक हो रहा है।
ऋषि श्री मारकंडेश्वर महादेव इतना सुन कर मार्कण्डेय ऋषि ने अपने पिता जी से कहा कि आप चिंता न करें मैं शंकर जी को मना लूँगा और अपनी मृत्यु को टाल दूंगा। इसके बाद वे घर से दूर एक जंगल में चले गए। वहां एक शिवलिंग स्थापना करके वे विधिपूर्वक पूजा अर्चना करने लगे। निश्चित समय आने पर काल पहुंचा।
महर्षि ने उनसे यह कहते हुए कुछ समय माँगा कि अभी वह शंकर जी कि स्तुति कर रहे हैं। जब तक वह पूरी कर नही लेते तब तक प्रतीक्षा करें। काल ने ऐसा करने से मना कर दिया तो मार्कण्डेय ऋषि जी ने विरोध किया। काल ने जब उन्हें ग्रसना चाहा तो वे शिवलिंग से लिपट गए। इस सब के बीच भगवान् शिव वहां प्रकट हुए। उन्होंने काल की छाती में लात मारी। उसके बाद मृत्यु देवता शिवजी कि आज्ञा पाकर वहां से चले गए।
मार्कण्डेय ऋषि की श्रद्धा और आस्था देख कर भगवन शंकर ने उन्हें अनेक कल्पों तक जीने का वरदान दिया। अमरत्व का वरदान पाकर महर्षि वापस अपने माता-पिता के पास आश्रम आ गए और उनके साथ कुछ दिन रहने के बाद पृथ्वी पर विचरने लगे और प्रभु की महिमा लोगों तक पंहुचाते रहे। श्री मार्कण्डेश्वर मंदिर परिसर धर्मक्षेत्र गंगा गोमती  संगम के तट पर नेशनल हाईवे नंबर 31 के समीप विद्यमान है। यह परिसर 8 एकड में फैला हुआ हैं।



धन्यवाद 

Markandeya Mahadev Story || मार्कंडेय महादेव की कहानी ! Markandey Mahadev Temple

मार्कण्डेय महादेव  गंगा-गोमती के संगम पर स्थित 'मारकण्डेय महादेव तीर्थ धाम' इसकी अनुपम मिशाल है। उत्तर प्रदेश के वाराणसी जनपद मु...