शुक्रवार, 9 जून 2023

Markandeya Mahadev Story || मार्कंडेय महादेव की कहानी ! Markandey Mahadev Temple

मार्कण्डेय महादेव 



गंगा-गोमती के संगम पर स्थित 'मारकण्डेय महादेव तीर्थ धाम' इसकी अनुपम मिशाल है। उत्तर प्रदेश के वाराणसी जनपद मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर गंगा-गोमती के संगम पर चौबेपुर के कैथी ग्राम के उत्तरी सीमा पर बना 'श्रीमारकण्डेय धाम' अपार जन आस्था का प्रमुख केन्द्र है। तमाम तरह की परेशानियों से ग्रसित लोग अपने दुःखों को दूर करने के लिए यहाँ आते हैं।


         मारकण्डेय महादेव मंदिर

           (1)पुत्र प्राप्ति स्थल
तब से गंगा-गोमती के तट पर बसा 'कैथी' गाँव मारकण्डेय जी के नाम से विख्यात है। यहाँ का तपोवन काफ़ी विख्यात है। यह गर्ग, पराशर, श्रृंगी, उद्याल आदि ऋषियों की तपोस्थली रहा है। इसी स्थान पर राजा दशरथ को पुत्र प्राप्ती के लिए श्रृंगी ऋषि ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराया था, जिसके परिणाम स्वरूप राजा दशरथ को पुत्र प्राप्त हुआ था। यही वह तपोस्थली है, जहाँ राजा रघु द्वारा ग्यारह बार 'हरिवंशपुराण' का परायण करने पर उन्हें उत्तराधिकारी प्राप्त हुआ था। पुत्र कामना के लिए यह स्थल काफ़ी दुर्लभ है। 'हरिवंशपुराण' का परायण तथा 'संतान गोपाल मंत्र' का जाप कार्य सिद्धि के लिए विशेष मायने रखता है। पुत्र इच्छा पुर्ति के लिए इससे बढ़ कर सिद्धपीठ स्थान कोई दूसरा नहीं है। 'मारकण्डे महादेव' के इस तपोस्थली पर हर समय पति-पत्नि का जोड़ा पीत वस्त्र धारण कर गाठ जोड़े पुत्र प्राप्ति के लिए 'हरिवंशपुराण' का पाठ कराते हैं। इस जगह आकर पूजा-अर्चना के बाद लोगों को मनोकामना सिद्धि मिलती है।
           (2)आयु एवं आरोग्य
मार्कण्डेय महादेव की कथा अनुसार (मेरे पिछली पोस्ट देखे) यहाँ से स्वंय यमराज को हार जाना पडा । आयु एवम आरोग्य प्राप्त करने हेतु श्रद्धालु यहाँ महामृत्युंजय जप तथा पूजा-पाठ करने का पूर्ण फल प्राप्त करते है।
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धन्यवाद 

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2022

80 वॉ वार्षिक श्रृंगार

                     श्री मार्कण्डेय महादेव धाम 
भूतभावन भगवान शंकर की पुनीत पतितपावनी सांस्कृतिक नगरी काशी के उत्तर पूर्व त्रिकोण पर गंगा और गोमता के पवित्र संगम पर महान तपस्वी महर्षि मारकण्डेश्वर महादेव का 80वॉ वार्षिकोत्सव श्रृङ्गार कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी वार रविवार दिनांक 06/11/2022 ई. को होना निश्चित है। अतः धर्म प्राण सज्जनों को पुण्य अवसर पर उपस्थित होकर बाबा के दर्शन व श्रृंगार मे तन मन धन
द्वारा अधिक से अधिक सहयोग देकर यश के भागी बने ।

मंगलवार, 25 अगस्त 2020

Ashtavakra Geeta || अष्टावक्र गीता प्रकरण १६ व १७ ASHTAVAKR GEETA PRKARAN 16 AND 17

 

अष्टावक्र गीता 

अष्टावक्र गीता प्रकरण १४ व १५ ASHTAVAKR GEETA PRAKARAN 14 AND 15

 

अष्टावक्र गीता 


अष्टावक्र गीता प्रकरण १०,११ व् १२,१३ ASHTAVAKR GEETA PRAKARAN 10,11,AND 12,13

अष्टावक्र गीता 

रविवार, 23 अगस्त 2020

अष्टावक्र गीता प्रकरण ७,८ ,९ ASHTAVAKR GEETA PRAKARAN 7,8,AND 9

अष्टावक्र गीता 





सप्तम प्रकरण

जनक उवाच -


मय्यनंतमहांभोधौ विश्वपोत इतस्ततः।

भ्रमति स्वांतवातेन न ममास्त्यसहिष्णुता॥७- १॥


राजा जनक कहते हैं - मुझ अनंत महासागर में विश्व रूपी जहाज अपनी अन्तः वायु से इधर - उधर घूमता है पर इससे मुझमें विक्षोभ नहीं होता है ॥१॥


मय्यनंतमहांभोधौ जगद्वीचिः स्वभावतः।

उदेतु वास्तमायातु न मे वृद्धिर्न च क्षतिः॥७- २॥


मुझ अनंत महासागर में विश्व रूपी लहरें माया से स्वयं ही उदित और अस्त होती रहती हैं, इससे मुझमें वृद्धि या क्षति नहीं होती है ॥२॥


मय्यनंतमहांभोधौ विश्वं नाम विकल्पना।

अतिशांतो निराकार एतदेवाहमास्थितः॥७- ३॥


मुझ अनंत महासागर में विश्व एक अवास्तविकता (स्वप्न) है, मैं अति शांत और निराकार रूप से स्थित हूँ ॥३॥


नात्मा भावेषु नो भावस्-तत्रानन्ते निरंजने।

इत्यसक्तोऽस्पृहः शान्त एतदेवाहमा स्थितः ॥७- ४॥


उस अनंत और निरंजन अवस्था में न 'मैं' का भाव है और न कोई अन्य भाव ही, इस प्रकार असक्त, बिना किसी इच्छा के और शांत रूप से मैं स्थित हूँ ॥४॥


अहो चिन्मात्रमेवाहं इन्द्रजालोपमं जगत्।

अतो मम कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना॥७- ५॥


आश्चर्य मैं शुद्ध चैतन्य हूँ और यह जगत असत्य जादू के समान है, इस प्रकार मुझमें कहाँ और कैसे अच्छे (उपयोगी) और बुरे (अनुपयोगी) की कल्पना ॥५॥


श्रीललितोपनिषत SHRI LALITOPANISHAT KUNDALANI


॥ श्रीललितोपनिषत् ॥


अष्टावक्र गीता प्रकरण 4 ,5 और 6 ASTHAVAKR GEETA PRKARAN 4,5,6,

अष्टावक्र गीता 



चतुर्थ प्रकरण 

अष्टावक्र उवाच -


हन्तात्म ज्ञस्य धीरस्य खेलतो भोगलीलया।

न हि संसारवाहीकै-र्मूढैः सह समानता॥४- १॥


अष्टावक्र कहते हैं - स्वयं को जानने वाला बुद्धिमान व्यक्ति इस संसार की परिस्थितियों को खेल की तरह लेता है,  उसकी सांसारिक परिस्थितियों का बोझ (दबाव)  लेने वाले मोहित व्यक्ति के साथ बिलकुल भी समानता नहीं है ॥१॥


यत् पदं प्रेप्सवो दीनाः शक्राद्याः सर्वदेवताः।

अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति॥४- २॥


जिस पद की इन्द्र आदि सभी देवता इच्छा रखते हैं, उस पद में स्थित होकर भी योगी हर्ष नहीं करता है ॥२॥ 


तज्ज्ञस्य पुण्यपापाभ्यां स्पर्शो ह्यन्तर्न जायते।

न ह्याकाशस्य धूमेन दृश्यमानापि सङ्गतिः॥४- ३॥


उस (ब्रह्म) को जानने वाले के अन्तःकरण से पुण्य और पाप का स्पर्श नहीं होता है जिस प्रकार आकाश में दिखने वाले धुएँ से आकाश का संयोग नहीं होता है ॥३॥


आत्मैवेदं जगत्सर्वं ज्ञातं येन महात्मना।

यदृच्छया वर्तमानं तं निषेद्धुं क्षमेत कः॥४- ४॥


जिस महापुरुष ने स्वयं को ही इस समस्त जगत के रूप में जान लिया है, उसके स्वेच्छा से वर्तमान में रहने को रोकने की सामर्थ्य किसमें है ॥४॥


आब्रह्मस्तंबपर्यन्ते भूतग्रामे चतुर्विधे।

विज्ञस्यैव हि सामर्थ्य- मिच्छानिच्छाविवर्जने॥४- ५॥


ब्रह्मा से तृण तक, चारों प्रकार के प्राणियों में केवल आत्मज्ञानी ही इच्छा और अनिच्छा का परित्याग करने में समर्थ है ॥५॥


आत्मानमद्वयं कश्चिज्-जानाति जगदीश्वरं।

यद् वेत्ति तत्स कुरुते न भयं तस्य कुत्रचित्॥४- ६॥


आत्मा को एक और जगत का ईश्वर कोई कोई ही जानता है, जो ऐसा जान जाता है उसको किसी से भी किसी प्रकार का भय नहीं है ॥६॥

Markandeya Mahadev Story || मार्कंडेय महादेव की कहानी ! Markandey Mahadev Temple

मार्कण्डेय महादेव  गंगा-गोमती के संगम पर स्थित 'मारकण्डेय महादेव तीर्थ धाम' इसकी अनुपम मिशाल है। उत्तर प्रदेश के वाराणसी जनपद मु...