मंगलवार, 28 जुलाई 2020

त्रिपुरा रहस्य तृतीय अध्याय (TRIPURA RAHASY CHAPTER 3)

त्रिपुरा रहस्य ज्ञान खंड 


तृतीय अध्याय 

बिना सत्सङ्गतः केन प्राप्तं श्रेयः परं कदा। 
लोकेSपि यादृशं सङ्गं यो यः प्रानपोति  मानवः।। 
तत्फलं स समाम्पोति  सर्वथा न हि संशयः। 
अत्रेति  कीर्त्तयिष्यामि शृणु राम कथामिमाम।। 

बिना सत्संग के भला कब किसी को परमश्रेय की प्राप्ति हुई हैं ?इसमें संदेह नहीं  लोक में भी जिस-जिसको जैसा-जैसा संग प्राप्त होता है उसे ठीक वैसा ही फल मिल जाता है। परशुराम !सुनो ,इस प्रसंग में मैं तुम्हे यह कथा सुनाता हूँ। 
आप त्रिपुरा रहस्य के  प्रथम अध्याय और द्वितीय अध्याय यहाँ से पढ़  सकते हैं। 

प्राचीन समय में मुक्ताचुड़ नाम से प्रसिद्ध एक दशार्ण देश का राजा था। उसके हेमचूड़ और मणिचूड नाम के दो पुत्र थे। दोनों ही बड़े रूपवान ,गुणवान और सब प्रकार की विद्याओं में कुशल थे। कहते है,किसी समय आखेट की इच्छा होने पर ये महाबली राजकुमार धनुष -बाण धारण कर बहुत सी सेना साथ ले सह्यपर्वत के भयङ्कर वन में घुस गये ,जो शेर बाघों आदि जानवरों से भरा हुआ था। वहां उन्होंने अपने धनुषों से छूटे हुए तीखे बाणों द्वारा बड़ीं फुर्ती से अनेको हिरण ,सिंह ,सूअर ,भैंसे और भेड़ियों का बध कर दिया।इस प्रकार जब वे राजकुमार अनेकों जंगली जीवों का शिकार कर  रहे थे वहाँ बड़ी प्रचण्ड आँधी उठी। उससे रेती और कंकर पत्थरों की वर्षा होने लगी। सारा आकाश धूल से भर गया। इससे अमावस्या की रात्रि सा अन्धकार छा गया। फिर वहां शिला ,वृक्ष,मनुष्य कुछ भी दिखाई देना बंद हो गया। उस पहाड़ पर ऐसा अँधेरा छाया कि कहाँ नीचा हैं ,कहाँ ऊचा हैं, यह भी दिखायी नहीं देता था। बालू  वर्षा से पीड़ित होकर सेना भी तितर-बितर होकर भाग गयी। सैनिकों में से किन्ही ने वृक्षों का,किसी ने शिलाओं का और किसी ने गुफाओं का आश्रय लिया। दोनों राजकुमार भी घोड़ो पर चढ़े हुए दूर निकल गये। उनमें से हेमचूड़ किसी तपस्वियों के आश्रम में पहुँच गया।  वह बड़ा ही रमणीक था और उसमें केले तथा खजुरो के वृक्ष लगे थे। वहाँ उसने अग्नि की ज्वाला के समान तेजस्विनी एक सुन्दरी कन्या देखी। उसका शरीर तपाये हुए सुवर्ण समान बड़ा कान्तिमान था। साक्षात् लक्ष्मी के समान रूपवती उस कन्या को देखकर राजपुत्र ने कुछ मुसकाते हुए पूछा ,कमलानने !तुम कौन हो ?निर्भये !इस भयङ्कर निर्जन वन में तुम विवश होकर किसलिए निवास कर  रही हो ?इस समय अकेली क्यों हो?इस प्रकार पूछे जाने पर उस निर्दोष बाला ने कहा,''राजपुत्र !आप ,भले आये। आइये आसन पर विराजिये। अतिथियों का सत्कार करना तो तपस्वियों का धर्म ही है। आप मुझे बहुत थके हुए और प्रचण्ड पवन से व्यथित जान पड़ते है। घोड़े को खजूर के पेड़ से बाँधकर यहाँ कुछ देर बैठकर विश्राम कीजिये। फिर आप मेरा सब वृत्तांत सुन लेंगे। ''कन्या के इस प्रकार कहने पर हेमचूड़ ने वैसा ही किया। उस बाला ने उसे कुछ फल खिलाये और जल पिने के लिये दिया। फिर उसे श्रमहीन देखकर वह मधु-सा बरसाने वाले मीठे शब्दों में कहने लगी ,''राजपुत्र !व्याघ्रपाद नाम के एक मुनि थे। वे भगवान शिव के चरणाश्रित थे। अपने तप के प्रभाव से उन्होंने स्वर्णादि पुण्यलोकों का अधिकार प्राप्त कर लिया था। वे ब्रह्मा ज्ञान सम्पन्न थे और बड़े-बड़े मुनिजन रत-दिन  सेवा में रहते थे।मैं उनकी धर्मपुत्री हूँ और हेमलेखा नाम से प्रसिद्ध हूँ। एक  सर्वाङ्ग सुन्दरी विद्युत्प्रभा नाम कि विद्याधरी इस वेणा  में स्न्नान करने के लिये आयी। संयोगवश उसी समय वहाँ बंग देश  राजा सुषेण भी आये। उन्होंने उस त्रिलोक सुन्दरी विद्याधरी को  नदीं में स्न्नान करते देखा उसके जल में भींगे झीने वस्त्रो में से दोनों पीन  पयोधर  दिखाई दे रहे थे। इससे राजा सुषेण कामबाण से विध गया और उस विद्याधरी  उसने प्रार्थना भी कर दी। राजा के सौंदर्य से  मोहित होकर उसने  उनकी बात मान ली। उसके साथ समागम करके राजा अपने नगर को चले गए। उस विद्याधरी को राजा के वीर्य से गर्भ रह गया। किन्तु इस व्यभिचार के कारण पति के डर से वह गर्भ को वहीं छोड़कर चली गयी। तब राजा के उस अमोघ वीर्य से मै कन्या उत्पन्न हुई। जब सन्ध्योपासना के लिए वहां व्याघ्रपाद मुनि आये तो उन्होंने मुझे देखा। वे दयावश मुझे उठा लाये और माता के समान मेरा पालन करने लगे। उनके प्रभाव से मुझे यहाँ कहीं भी किसी प्रकार का भय नहीं हैं। इस आश्रम में कोई देवता या असुर भी दूषित विचार से प्रवेश नहीं कर सकता। यदि करेगा तो नष्ट हो जायेगा। यह मैंने आपको अपना वृतान्त सुनाया !राजपुत्र !आप कुछ देर यहाँ ठहरिये। मेरे पिता भगवान व्याघ्रपाद आने ही वाले हैं। उनके दर्शन करे और उन्हें प्रणाम करके अपना मनोरथ पूरा कराकर कल प्रातः काल प्रस्थान करें। हेमलेखा की बात सुनकर उसके सौंदर्य से मोहित हो जाने के कारण धैर्य धारण रखा। कुछ समय बाद ही मुनि वन से पुष्पादि संग्रह कर के आ गये। उन्हें आये देखकर राजपुत्र खड़ा हो गया। उसने अपना नाम लेकर मुनि को प्रणाम किया और उनकी आज्ञा पाकर बैठ गया मुनिने देखा की काम के कारण राजपुत्र की चेष्टा विकृत -सी हो गयी है,तो योगबल से उन्होंने सब  हाल जान लिया और उसे उचित ही समझा। अतः उन्होंने पत्नी रूप से उसे हेमलेखा दे दी। इससे राजकुमार को बड़ी प्रसन्नता हुई और वह उसे लेकर नगर में लौट आया। राजा मुक्ताचुड़ भी बहुत संतुष्ट हुआ और उसने बड़ा महोत्सव करके उनका विधिवत विवाह संस्कार सम्पन्न कर दिया। 
तब राजा महलो ,उपवनो ,और नदी तटों आदि स्थानों में उसके साथ निरंतर विहार करने लगा। किन्तु उसने देखा की हेमलेखा को भोगों की विशेष कामना नहीं हैं और वह सर्वदा उदासीन ही रहती है। तब एक दिन उसने एकांत में उससे पूछा,''प्रिये !मई तुमसे प्रेम करता हूँ तो भी तुम अपने प्रियतम से प्रेम क्यों नहीं करती ?तुम्हारी मुस्कान बड़ी मनोहारिणी है ,किन्तु भोगों  तुम्हारी विशेष रूचि क्यों नहीं हैं। क्या यहाँ के भोग तुम्हारे मन के अनुकूल नहीं है ?फिर ये उदासीनता क्यों?जब मै पास नहीं होता तो तुम नेत्र मूँदे बैठी रहती हो। यह बात मै जब-जब तुम्हारे पास आता हूँ तब-तब ही देखता हूँ। तुम मुझे प्राणो से भी प्रिय हो। बताओ तो तुम्हारा चित्त ऐसा विषयविमुख क्यों हो गया है। तुम्हें मेरी सौगन्ध हैं। बोलो, जिससे मेरे मन का समाधान हो। 

In the ancient times a Dasarna known as Muktachud was the king of the country. He had two sons named Hemchud and Manichud. Both were very handsome, talented and skilled in all kinds of learning. It is said, that at some time, on the desire of the game, this Mahabali prince, wearing a bow and arrow, took many army and entered the fearful forest of Sahyaparvat, which was full of animals like lions, tigers etc. There they swiftly killed many deer, lions, pigs, buffaloes and wolves with sharp arrows left by their bows.Thus, when the prince was hunting many wild creatures, a huge storm arose. It started to rain sand and sandstone. The whole sky was filled with dust. This led to darkness like Amavasya night. Then there were stones, trees, human beings and nothing was visible. It did not even show such a dark shadow on that mountain, where it is low, where it is high. Suffering from sand rain, the army also dispersed and fled. Some of the soldiers took shelter of trees, some of rocks and some took shelter of caves.The two princes also went away on horseback. Hemchud among them reached the ashram of some ascetics. He was very beautiful and had banana and palm trees. There he saw a beautiful girl Tejaswini like a flame of fire. His body was as big as a golden gold. Seeing the girl who looked like a real Lakshmi, the Rajputra smiled and asked, Kamalanane! Who are you? Nirbhaye! Why are you living in this fearless deserted forest forcing you? Why are you alone at the moment?When asked in this way, that innocent Bala said, "Rajputra! You may come good." Let's sit on the seat. It is the religion of ascetics to greet guests. You seem very tired and distressed by the strong wind. Tie the horse to the palm tree and sit here and rest for a while. Then you will listen to all my accounts. Hemchud did the same on the saying of a girl. The lady fed him some fruits and gave him water to drink.Seeing her laborless, she started saying in sweet words that showers like honey, "Rajputra! There was a sage named Vyaghrapad. He was a follower of Lord Shiva. With the influence of his tenacity, he had acquired the right to the Swarnadi virtues. He was full of knowledge of Brahma and the great munizans lived in day-to-day service. I am his godfather and famous by the name Hemlekha. Vidyadhari came in this vena to take a bath, named Sarvand Sundari Vidyutprabha. Coincidentally, at the same time Bang Bang king Sushen also came there.They saw that Trilok Sundari Vidyadhari snoring in the river, both of them peen payodhar were visible in the wet clothes soaked in its water. This led King Raja to go to Kamban and prayed to the student. Fascinated by the beauty of the king, he obeyed him. After meeting with him, the king went to his city. That scholar became pregnant with the king's semen. But due to this adultery, she left the womb there due to fear of husband. Then I gave birth to a girl from that inferior semen of the king.When Vyaghrapada Muni came there for the rituals, he saw me. They mercifully picked me up and started following me like a mother. I do not have any kind of fear anywhere from his influence. No deity or asura can enter this ashram with corrupt thoughts. If you do, it will be destroyed. I told you my account! Rajputra! You stay here for some time. My father Lord Vyaghrapada is about to come.Visit them and greet them and complete your wish and leave tomorrow morning. Hearing Hemlekha, she was patient and fascinated by her beauty. After some time, Muni came from the forest by collecting flowers. On seeing them, the Rajputra stood up. He bowed to the sage after taking his name and sat down after getting his orders. Muni saw that due to the work, the efforts of the Rajputra have become distorted, so he knew everything from the yogabal and thought it appropriate.So he gave her Hemlekha as wife. This pleased the prince and he returned to the city with him. King Muktachud too was very satisfied and duly performed his marriage ceremony after doing a big festival.
Then the king began to frequent the palaces, uplands and river banks etc. with him. But she saw that Hemlekha does not have special wishes for indulgence and always remains indifferent.Then one day he asked her in seclusion, "Honey! I love you, even then why don't you love your sweetheart? Your smile is very charming, but why enjoyers are not your special interest. Is the enjoyment of this place not suitable for your mind? Then why this indifference? When I do not pass then you are sitting blind. I only see this when I come to you.You love me too. Tell me why your mind has become such a subject. You swear on me, so that my mind can be resolved.




तृतीय अध्याय समाप्त 

शनिवार, 25 जुलाई 2020

त्रिपुरा रहस्य द्वितीय अध्याय (TRIPURA RAHASYA CHAPTER 2)

त्रिपुरा रहस्य ज्ञान खंड 



द्वितीय अध्याय 

एवं जना हितेच्छाभिः कर्तव्यविषमूर्च्छिताः। 
अहो विनाशं यान्त्युच्चैर्मोहेनांधिकृताः खलु।। 

                                                                       आप ने त्रिपुरा रहस्य प्रथम अध्याय में परशुराम जी  और भगवान दत्तात्रेय जी के संवाद को पढ़ा होगा और अब हम द्वितीय अध्याय में दत्तात्रेय जी द्वारा कथानक रूप में समझाये गये रहस्यों को समझने का प्रयास करेंगे।                                                                                        

                                                                             कुछ यात्री विन्ध्याचल पर्वत पर जा पहुँचे। वे भूख से अत्यन्त व्याकुल थे। वहां वे फल खोजने लगे ,और काजू के फल समझकर कुचला के फल खा गये। अत्यन्त भूखे होने  कारण उनकी रसनेन्द्रिय शक्तिहीन हो  गयी थी। अब कुचला के विष की ज्वाला उनके अंग-अंग में जलन होने लगी। उससे उन्हें बड़ी बेचैनी हुई। उन्हें यह तो  पता नहीं था की हमने कुचला के फल खा लिये हैं ,अतः अपने शरीर में उस ज्वाला को काजू खाने का ही परिणाम समझकर वे अंधे से होकर उसकी शान्ति के लिये खोज करने लगे तो उन्हें धतूरे के फल मिल गये। भ्रमवश उन सबने उन्हें नीबू समझकर खा लिया। इससे वे और भी पागल हो गये और अपने मार्ग से भटक कर उस घोर जंगल में गड्ढ़ों में गिरने-पड़ने लगे। उनके सारे शरीर में काँटे लग गये ,हाथ-पैर और घुटने घायल हो गये तथा वे  दूसरे को बुरा-भला कहकर आपस में बड़ा कलह करने लगे। देखते ही देखते वे एक दूसरे पर घूसे ,पत्थर और लकड़ियाँ चलाने लगे। इससे उनके सब अंग क्षत -विक्षत हो गये। अंत में वे किसी नगर के पास जा पहुंचे। दैववश वे आधी रात के समय नगर के द्वार पर पहुँचे। उस समय द्वारपाल ने उन्हें नगर में प्रवेश करने से रोका। उन्हें तो किसी देश-काल का ज्ञान तो था नहीं ,इसलिए वे उनके साथ भी झगड़ा करने लगे। अब तो द्वारपालों ने भी उनको खूब पीटा। तब वे इधर-उधर भागने लगे। उनमें से कुछ तो नगर की खाई में गिर गये और वहाँ मकर आदि जल जन्तुओ ने उन्हें खा लिया। कुछ ने गड्ढ़ों और कुओं में गिर कर प्राण त्याग दिये और कोई उनसे मार खाकर किसी प्रकार अपनी  बचाकर भाग गये। 

अविचार से अकर्त्तव्य को ही कर्त्तव्य समझकर लोग सब  प्रकार से मोह में पड़  जाते है और विचारपूर्वक कर्म करने पर वे सब प्रकार के अपार संकटो से भी छुटकारा पा लेते हैं। 

Some travelers reached Mount Vindhyachal. He was very distraught with hunger. There they started searching for fruits, and considering the fruits of cashew, they ate the fruits of the crushed. Due to being very hungry, his sensory sense was powerless. Now the flame of poison of poison started burning in his limbs. This caused him great discomfort. They did not know that we had eaten the fruits of the crushed.Therefore, considering that flame in his body as the result of eating cashew nut, when he went blindly and searched for his peace, he found the fruits of the metal. Confusing them, they all ate them as lemon. Due to this, they became even more mad and wandered off their path and started falling into the pits in that thick forest.All their bodies were thorns, hands and feet and knees were injured, and they started making great discord among themselves, calling each other bad. As soon as they saw each other, they started to punch, stone and fire at each other. All their parts were damaged due to this. Finally, they reached a city. Divinely they reached the city gate at midnight. At that time the gatekeeper prevented them from entering the city.They had no knowledge of any country and era, so they started quarreling with them. Now even the gatekeepers beat him a lot. Then they started running around. Some of them fell into the abyss of the city and there were animals like Makar etc. Some fell into pits and wells and gave up their lives, and some escaped after escaping from them somehow.


By thinking of Akartavya as duty due to inadvertence, people fall into all kinds of fascination and by doing thoughtful deeds, they also get rid of all kinds of immense troubles.

शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

त्रिपुरा रहस्य

त्रिपुरा रहस्य 

त्रिपुरा रहस्य के तीन खण्ड हैं -प्रथम माहात्म्य ,द्वितीय चर्या और तृतीय ज्ञान खण्ड हैं। माहात्म्य खण्ड में 6687 श्लोको की संख्या बतायी जाती है और ज्ञान खंड में 12000 श्लोको की संख्या को बतलाया गया हैं और चर्या खंड लुप्त हो चुका है। 
     

              ज्ञान खंड 


                                                                      प्रथम अध्याय 


                                                                           इस ग्रंथ के प्रणेता महर्षि हरितायन हैं। उन्होंने भगवान अवधूत दत्तात्रेय और परशुराम जी का यह संवाद देवर्षि नारद को सुनाया है। परशुराम जी ने पहले भगवान दत्तात्रेय के मुखारबिन्द से भगवती त्रिपुरा देवी की महिमा सुनी। इससे उनके हृदय में भक्ति भाव उत्पन्न हुआ और वह देवी की उपासना हेतु महेंद्र पर्वत जा कर बारह वर्षो तक कठिन तपस्या की और तपस्या में लीन रहने के बावजूद उनको सृष्टि चक्र और परमार्थ तत्व की समस्या से आन्दोलित रहने लगे। परन्तु वह इस विषय में वे गुरुवर संवर्त से जिज्ञासा कर चुके थे ,उस समय परशुराम जी को उनकी कोई भी बात समझ में नहीं आयी। और उन्होंने वहाँ से शीघ्र ही गंधमादन पर्वत पर पहुंचकर भगवान दत्तात्रेय जी को  दण्डवत प्रणाम किया और फिर अपने हाथो में उनके  चरणकमलो  को लेकर उनपर अपना सिर रखा। 


                                                                                     परशुराम जी को  इस प्रकार प्रणाम करते देखकर गुरु दत्तात्रेय जी प्रसन्न होकर उनको उठाया और आशीर्वाद देते हुए कहा स्वस्थ तो रहे? अपना वृत्तान्त सुनाओ ! परशुराम जी बोले -मै तो आपकी कृपा से आनन्दित हूँ तथापि बहुत दिनों से एक बात मेरे ह्रदय में खटक रही हैं आज्ञा हो तो आपसे पूछू। 
दत्तात्रेय बोले - भार्गव तुम्हारे चित्त में जो प्रश्न बसा हुआ है वह पूछो। मै तुम्हारे भक्ति भाव से प्रसन्न हूँ। तुम जो चाहते हो वह मै बताऊँगा।  


Maharishi Haritayan is the pioneer of this book. He has told this dialogue of Lord Avdhoot Dattatreya and Parashurama to Devarshi Narada. Parashurama first heard the glory of Bhagwati Tripura Devi from the mouth of Lord Dattatreya. This created a feeling of devotion in his heart and he went to Mahendra mountain to worship Goddess for twelve years and did hard penance and despite being engaged in austerity, he started agitating with the problem of creation cycle and charitable elements.

But he had been curious about this topic from Guruvar Samvart, at that time Parashurama could not understand any of his things. And soon after that they reached Gandhamadan mountain and offered obeisance to Lord Dattatreya ji and then took their feet in their hands and placed their heads on them.
Seeing Parshuram bowing like this, Guru Dattatreya ji was pleased and picked him up and said while blessing him, be healthy? Tell me your story! Parashuram ji said - I am happy with your grace, however, for a long time, one thing has been knocking in my heart, if you have the command, then ask me.
Dattatreya said - Bhargava ask the question which is in your mind. I am happy with your devotion. I will tell you what you want.

बुधवार, 22 जुलाई 2020

आत्मबोध प्रश्रोत्तरी


 


प्रश्न 
                                                                           




          आकाशाद्वितता या स्यात सूक्ष्मा परमाणुतः। 
            सा  किंरूपा  स्थिता  कुत्र वदैतन्नृपपुत्रक।। 

अर्थ -:राजकुमार !बतलाओ ,जो वस्तु आकाश से भी अधिक विस्तृत और परमाणु से भी अधिक सूक्ष्म है ,उसका क्या स्वरूप हैं और वह कहाँ हैं ?

                                                 वितता चितिराकाशात सूक्ष्मा च प्रमाणुतः। 
                                                 स्फुरद्रुपा स्वात्मसंस्था शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ः।। 
                                                                                        
अर्थ -: ब्रह्मराक्षस !सुन ,चिति आकाश से भी विस्तृत और परमाणु से भी अधिक सूक्ष्म हैं।वह स्फुरणरूपा है और अपने आत्मा में ही स्थित है। 
    
                                                   
          एकापि साSतीवितता कथं सूक्ष्मतरा भवेत्। 
           स्फुरत्त्वं किं किमात्मा च वदैतन्नृपनन्दनम।। 

 अर्थ -:राजपुत्र !वह एक होने पर भी अत्यन्त विस्तृत और अत्यन्त सूक्ष्म कैसे हो सकती है? स्फुरण क्या है और आत्मा क्या है-यह बताओ ?                                                  


                                                   कारणत्वाद्धि वितता सूक्ष्मा ग्राह्यत्वतोSपि च। 
                                                    स्फुरत्वमात्मा च चिति ः शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस।। 

 अर्थ -:ब्रह्मराक्षस !सुन ,सबका कारण होने के कारण वह विस्तृत है और इद्रिय आदि से ग्राहा न होने के कारण सूक्ष्म है। तथा स्फुरण और आत्मा चिति को ही कहते है। 


     स्थानं तदुपलब्धौ किं  कथं वा सोपलभ्यते। 
     उपलब्ध्या च  किं  वा स्याद्वदैतन्नृपनंदन।। 

अर्थ -:राजकुमार !बताओ ,उसकी उपलब्धिका स्थान क्या है ?किस प्रकार उसकी उपलब्धि होती है ?और उसे उपलब्ध कर लेने से क्या होता है?

  
                                                   
                                                                                                                              क्रमशः 



मंगलवार, 21 जुलाई 2020

शिव सूत्र shiva sutra



   शिवसूत्र

शिवसूत्र उन ७७ सूत्रों के समूह को कहते हैं जो काश्मीरी शैव दर्शन के आधार हैं। इनके रचयिता वसुगुप्त माने जाते हैं जिनका समय ९वीं शताब्दी है। यह तीन भाग  ,शाम्भवोपाय ,शाक्तोपाय ,और आणवोपाय में विभक्त हैं.

१- शाम्भवोपाय


चैतन्यमात्मा । १-१।
ज्ञानं बन्धः । १-२।
योनिवर्गः कलाशरीरम् । १-३।
ज्ञानाधिष्ठानं मातृका । १-४।
उद्यमो भैरवः । १-५।
शक्तिचक्रसन्धाने विश्वसंहारः । १-६।
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तभेदे तुर्याभोगसंभवः । १-७।
ज्ञानं जाग्रत् । १-८।
स्वप्नो विकल्पाः । १-९।
अविवेको मायासौषुप्तम् । १-१०।
त्रितयभोक्ता वीरेशः । १-११।
विस्मयो योगभूमिकाः । १-१२।
इच्छा शक्तिरुमा कुमारी । १-१३।
दृश्यं शरीरम् । १-१४।
हृदये चित्तसंघट्टाद् दृश्यस्वापदर्शनम् । १-१५।
शुद्धतत्त्वसन्धानाद् वा अपशुशक्तिः । १-१६।
वितर्क आत्मज्ञानम् । १-१७।
लोकानन्दः समाधिसुखम् । १-१८।
शक्तिसन्धाने शरीरोत्पत्तिः । १-१९।
भूतसन्धान भूतपृथक्त्व विश्वसंघट्टाः । १-२०।
शुद्धविद्योदयाच्चक्रेशत्व सिद्धिः । १-२१।
महाह्रदानुसन्धानान्मन्त्रवीर्यानुभवः । १-२२।

२- शाक्तोपाय


चित्तं मन्त्रः । २-१।
प्रयत्नः साधकः । २-२।
विद्याशरीरसत्ता मन्त्ररहस्यम् । २-३।
गर्भे चित्तविकासोऽविशिष्ट विद्यास्वप्नः । २-४।
विद्यासमुत्थाने स्वाभाविके खेचरी शिवावस्था । २-५।
गुरुरुपायः । २-६।
मातृकाचक्रसम्बोधः । २-७।
शरीरं हविः । २-८।
ज्ञानं अन्नम् । २-९।
विद्यासंहारे तदुत्थ स्वप्न दर्शनम् । २-१०।

३- आणवोपाय


आत्मा चित्तम् । ३-१।
ज्ञानं बन्धः । ३-२।
कलादीनां तत्त्वानां अविवेको माया । ३-३।
शरीरे संहारः कलानाम् । ३-४।
नाडी संहार भूतजय भूतकैवल्य भूतपृथक्त्वानि । ३-५।
मोहावरणात् सिद्धिः । ३-६।
मोहजयाद् अनन्ताभोगात् सहजविद्याजयः । ३-७।
जाग्रद् द्वितीयकरः । ३-८।
नर्तक आत्मा । ३-९।
रङ्गोऽन्तरात्मा । ३-१०।
प्रेक्षकाणीन्द्रियाणि । ३-११।
धीवशात् सत्त्वसिद्धिः । ३-१२।
सिद्धः स्वतन्त्रभावः । ३-१३।
यथा तत्र तथान्यत्र । ३-१४।
विसर्गस्वाभाव्याद् अबहिः स्थितेस्तत्स्थितिः । ३-१५।
बीजावधानम् । ३-१६।
आसनस्थः सुखं ह्रदे निमज्जति । ३-१७।
स्वमात्रा निर्माणं आपादयति । ३-१८।
विद्या अविनाशे जन्म विनाशः । ३-१९।
कवर्गादिषु माहेश्वर्याद्याः पशुमातरः । ३-२०।
त्रिषु चतुर्थं तैलवदासेच्यम् । ३-२१।
मग्नः स्वचित्तेन प्रविशेत् । ३-२२।
प्राण समाचारे समदर्शनम् । ३-२३।
मध्येऽवर प्रसवः । ३-२४।
मात्रास्वप्रत्यय सन्धाने नष्टस्य पुनरुत्थानम् । ३-२५।
शिवतुल्यो जायते । ३-२६।
शरीरवृत्तिर्व्रतम् । ३-२७।
कथा जपः । ३-२८।
दानं आत्मज्ञानम् । ३-२९।
योऽविपस्थो ज्ञाहेतुश्च । ३-३०।
स्वशक्ति प्रचयोऽस्य विश्वम् । ३-३१।
स्तिथिलयौ । ३-३२।
तत् प्रवृत्तावप्यनिरासः संवेत्तृभावात् । ३-३३।
सुख दुःखयोर्बहिर्मननम् । ३-३४।
तद्विमुक्तस्तु केवली । ३-३५।
मोहप्रतिसंहतस्तु कर्मात्मा । ३-३६।
भेद तिरस्कारे सर्गान्तर कर्मत्वम् । ३-३७।
करणशक्तिः स्वतोऽनुभवात् । ३-३८।
त्रिपदाद्यनुप्राणनम् । ३-३९।
चित्तस्थितिवत् शरीर करण बाह्येषु । ३-४०।
अभिलाषाद्बहिर्गतिः संवाह्यस्य । ३-४१।
तदारूढप्रमितेस्तत्क्षयाज्जीवसंक्षयः । ३-४२।
भूतकञ्चुकी तदा विमुक्तो भूयः पतिसमः परः । ३-४३।
नैसर्गिकः प्राणसंबन्धः । ३-४४।
नासिकान्तर्मध्य संयमात् किमत्र सव्यापसव्य सौषुम्नेषु । ३-४५।
भूयः स्यात् प्रतिमीलनम् । ३-४६।
ॐ तत् सत्

धन्यवाद

सोमवार, 20 जुलाई 2020

मृत्यु सूचक लक्षण


मृत्यु के निकट आने पर जो चिन्ह /लक्षण प्रकट होते है। 

  • जिसके मल मूत्र और वीर्य या मल मूत्र एवं छींक एक साथ ही गिरते है ,उसकी आयु केवल एक वर्ष और शेष है यानि वह एक वर्ष उपरांत मृत्यु को प्राप्त होगा। 
  • जो इंद्रनीलमणि के समान रंगवाले नागों के झुण्ड को आकाश में फैला हुआ देखता है ,वह छः महीने भी जीवित नहीं रहता। 
  • जिसकी मृत्यु निकट है वह ध्रूव (तारा )को भी नहीं देख पाता। 
  • जो अकस्मात रंगो और स्वादो  के विपरीत रूप से देखने और अनुभव करने लगता है वह केवल छः महीने में मृत्यु को प्राप्त होता। 
  • वीर्य ,नख, और आँखो का कोना ये सब यदि नील या काले रंग के हो जाये तो मनुष्य छः महीने के अंदर ही में मृत्यु को प्राप्त होगा। 
  • अच्छी तरह स्न्नान करने के उपरांत भी अगर जिनका ह्रदय शीघ्र ही सूख जाता है तथा हाथ और पैर भी जल्दी सूख जाते है तो उनका जीवन केवल तीन महीने ही चलता हैं। 
  • जो मनुष्य जल ,घी ,और दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब नहीं देख पाता वह केवल एक मास /महीने ही जीवित रहता है। 
  • बुद्धि भ्रष्ट हो जाये ,वाणी स्पष्ट न निकले ,रात में इंद्रधनुष का दर्शन हो ,दो चन्द्रमा और दो सूर्य दिखायी दे तो यह मृत्यु सूचक है। 
  • कान बंद कर लेने के बाद कोई भी आवाज न सुनायी दे तथा मोटा शरीर थोड़े ही दिनों में पतला एवं दुबला -पतला शरीर मोटा हो जाये तो उसकी एक महीने में मृत्यु हो जाती है। 
  • जिसे स्वप्न में भूत ,प्रेत ,पिशाच ,असुर ,कौए,कुत्ते,गिद्ध सियार ,गधे और सूअर इधर -उधर ले जाते है और खाते है वह वर्ष के अंत में प्राणांत हो जाता हैं। 
  • जो स्वप्न में अपने को गन्ध पुष्प और लाल वस्त्रो से विभूषित देखता है ,वह उस दिन से केवल आठ महीने ही जीवित रहता है। 
  • जो स्वप्न में अपने को तेल लगाये ,मूड़ मुड़ाये और गदहे पर चढ़े दक्षिण दिशा की ओर ले जाये जाते देखता है तो उसकी छः महीने में हो जाती है। 
  • जो मनुष्य स्वप्न में बानर की सवारी पर चढ़कर पूर्व दिशा की ओर जाता है ,वह पाँच ही दिन में मृत्यु  प्राप्त होता है। 
  • जो स्वप्न में लोहे का डंडा और काला वस्त्र धारण करने वाला किसी काले रंग के पुरुष को अपने आगे खड़े देखता है। 
  • Whose stool urine and semen or stool urine and sneeze fall together, his age is only one year and the rest means that he will die after one year.
  • One who sees a flock of serpents of color like INDRNILMANI spreads in the sky, he does not live even for six months.
  • The one who is near death cannot even see the DHURVA (star).
  • One who suddenly begins to see and experience the opposite of colors and tastes would have died in only six months.
  • If all of these semen, nails, and eyes are turned into indigo or black color, then a person will die within six months.
  • Even after drinking well, if the heart dries up quickly and the hands and feet also dry quickly, then their life only lasts for three months.
  • A person who cannot see his image in water, ghee, and mirror lives only one month / month.
  • Wisdom should be corrupted, speech should not be clear, rainbow should be seen at night, if two moons and two suns are visible then it is a sign of death.
  • After closing the ears, no sound is heard and if the fat body becomes thin and lean and fat in a few days, then it dies in a month.
  • The one whom ghosts, ghosts, vampires, asuras, crows, dogs, vulture jackals, donkeys and pigs carry and eat in their dreams, dies at the end of the year.
  • One who sees himself in a dream adorned with smells of flowers and red clothes, lives only eight months from that day.
  • In a dream, if you see yourself applying oil, turning your head and moving on the donkey towards south direction, then it is done in six months.
  • In a dream, a person who goes on the ride of the monkey and goes towards the east, dies in five days.
  • Who sees in the dream a black man wearing an iron stick and a black robe standing in front of him.

शनिवार, 18 जुलाई 2020

मोक्षदायनी काशी




वाराणसी (काशी )



मोक्षदायनी काशी एवं गँगा 




 काशी ,वाराणसी ,बनारस भारत  ही नहीं अपितु संसार के प्राचीनतम नगरों में से एक हैं। यह वरुणा एवं अस्सी दो नदियों से मिलकर बना है। 
                                     वर्त्तमान काशी में दर्शनीय मंदिर बाबा विश्वनाथ ,माँ अन्नपूर्णा ,श्री मार्कण्डेय महादेव ,बाबा भैरवनाथ ,संकटमोचन ,दुर्गा कुण्ड ,तुलसी मंदिर ,BHU विश्वनाथ ,आदि विश्वेश्वर ,साक्षी विनायक ,पांच रत्न आदि। 
कुण्डो तथा वापियों में दुर्गा कुण्ड ,पुष्कर कुण्ड ,पिशाचमोचन ,कपिलधारा ,लोलार्क,मानसरोवर तथा मन्दाकिनी आदि प्रमुख है। काशी घाटों के लिए विख्यात है और बनारस में अनेको घाट है। उनमें से अस्सी ,दशाश्वमेध ,हरिश्चंद्र 
मणिकर्णिका ,अहिल्या,आदि प्रसिद्ध घाट हैं। 

Markandeya Mahadev Story || मार्कंडेय महादेव की कहानी ! Markandey Mahadev Temple

मार्कण्डेय महादेव  गंगा-गोमती के संगम पर स्थित 'मारकण्डेय महादेव तीर्थ धाम' इसकी अनुपम मिशाल है। उत्तर प्रदेश के वाराणसी जनपद मु...