बुधवार, 12 अगस्त 2020

दुर्गा सप्तशती (प्रथम अध्याय )Durga Saptashati Chapter First


 पहला अध्याय (Chapter First )



महर्षि ऋषि का राजा सुरथ और समाधि को देवी की महिमा बताना

महर्षि मार्कण्डेय बोले – सूर्य के पुत्र सावर्णि की उत्पत्ति की कथा विस्तारपूर्वक कहता हूँ सुनो, सावर्णि महामाया की कृपा से जिस प्रकार मन्वन्तर के स्वामी हुए, उसका भी हाल सुनो। पहले स्वारोचिष नामक राज्य था। वह प्रजा को अपने पुत्र के समान मानते थे तो भी कोलाविध्वंशी राजा उनके शत्रु बन गये। दुष्टों को दण्ड देने वाले राजा सुरथ की उनके साथ लड़ाई हुई, कोलाविध्वंसियों के संख्या में कम होने पर भी राजा सुरथ युद्ध में उनसे हार गए। तब वह अपने नगर में आ गये, केवल अपने देश का राज्य ही उनके पास रह गया और वह उसी देश के राजा होकर राज्य करने लगे किन्तु उनके शत्रुओं ने उन पर वहाँ आक्रमण किया।

राजा को बलहीन देखकर उसके दुष्ट मंत्रियों ने राजा की सेना और खजाना अपने अधिकार में कर लिया। राजा सुरथ अपने राज्याधिकार को हार कर शिकार खेलने के बहाने घोड़े पर सवार होकर वहाँ से एक भयंकर वन की ओर चल गये। उस वन में उन्होंने महर्षि मेधा का आश्रम देखा, वहाँ मेधा महर्षि अपने शिष्यों तथा मुनियों से सुशोभित बैठे हुए थे और वहाँ कितने ही हिंसक जीव परम शान्ति भाव से रहते थे। राजा सुरथ ने महर्षि मेधा को प्रणाम किया और महर्षि ने भी उनका उचित सत्कार किया। राजा सुरथ महर्षि के आश्रम में कुछ समय तक ठहरे।

अपने नगर की ममता के आकर्षण से राजा अपने मन में सोचने लगे – पूर्वकाल में पूर्वजों ने जिस नगर का पालन किया था वह आज मेरे हाथ से निकल गया। मेरे दुष्ट एवं दुरात्मा मंत्री मेरे नगर की अब धर्म से रक्षा कर रहे होंगे या नहीं? मेरा प्रधान हाथी जो कि सदा मद की वर्षा करने वाला और शूरवीर था, मेरे वैरियों के वश में होकर न जाने क्या दुख भोग रहा होगा? मेरे आज्ञाकारी नौकर जो मेरी कृपा से धन और भोजन पाने से सदैव सुखी रहते थे और मेरे पीछे-पीछे चलते थे, वह अब निश्चय ही दुष्ट राजाओं का अनुसरण करते होगें तथा मेरे दुष्ट एवं दुरात्मा मंत्रियों द्वारा व्यर्थ ही धन को व्यय करने से संचित किया हुआ मेरा खजाना एक दिन अवश्य खाली हो जाएगा। इस प्रकार की बहुत सी बातें सोचता हुआ राजा निरन्तर दुखी रहने लगा।

एक दिन राजा सुरथ ने महर्षि मेधा के आश्रम के निकट एक वैश्य को देखा, राजा ने उससे पूछा-भाई, तुम कौन हो? यहाँ तुम्हारे आने का क्या कारण है और तुम मुझे शोकग्रस्त अनमने से दिखाई देते हो इसका क्या कारण है? राजा के यह नम्र वचन सुन वैश्य ने महाराज सुरथ को प्रणाम करके कहा, वैश्य बोला- राजन! मेरा नाम समाधि है, मैं धनियों के कुल में उत्पन्न एक वैश्य हूँ, मेरे दुष्ट स्त्री-पुत्रादिकों ने लोभ से मेरा सब धन छीन लिया है और मुझे घर से निकाल दिया है। मैं इस तरह से दुखी होकर इस वन में चला आया हूँ और यहाँ रहता हुआ मैं इस बात को भी नहीं जानता कि अब घर में इस समय सब कुशल हैं या नहीं।

यहाँ मैं अपने परिवार का आचरण संबंधी कोई समाचार भी नहीं पा सकता कि वह घर में इस समय कुशलपूर्वक हैं या नहीं। मैं अपने पुत्रों के संबंध में यह भी नहीं जानता कि वह सदाचारी हैं या दुराचार में फँसे हुए हैं। राजा बोले-जिस धन के लोभी स्त्री, पुत्रों ने तुम्हेंं घर से निकाल दिया है, फिर भी तुम्हारा चित्त उनसे क्यों प्रेम करता है। वैश्य ने कहा-मेरे विषय में आपका ऎसा कहना ठीक है, किंतु मेरा मन इतना कठोर नहीं है। यद्यपि उन्होंने धन के लोभ में पड़कर पितृस्नेह को त्यागकर मुझे घर से निकाल दिया है, तो भी मेरे मन में उनके लिए कठोरता नहीं आती।

हे महामते! मेरा मन फिर भी उनमें क्यों फँस रहा है, इस बात को जानता हुआ भी मैं नहीं जान राह, मेरा चित्त उनके लिए दुखी है। मैं उनके लिए लंबी-लंबी साँसे ले रहा हूँ, उन लोगों में प्रेम नाम को नहीं है, फिर भी ऎसे नि:स्नेहियों के लिए मेरा हृदय कठोर नहीं होता । महर्षि मार्कण्डेयजी ने कहा-हे ब्रह्मन्! इसके पश्चात महाराज सुरथ और वह वैश्य दोनों महर्षि मेधा के समीप गये और उनके साथ यथायोग्य न्याय सम्भाषण करके दोनों ने वार्ता आरम्भ की। राजा बोले-हे भगवन! मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ, सो आप कृपा करके मुझे बताइए, मेरा मन अधीन नहीं है, इससे मैं बहुत दुखी हूँ, राज्य, धनादिक की चिंता अभी तक मुझे बनी हुई है और मेरी यह ममता अज्ञानियों की तरह बढ़ती ही जा रही है और यह समाधि नामक वैश्य भी अपने घर से अपमानित होकर आया है, इसके स्वजनों ने भी इसे त्याग दिया है, स्वजनों से त्यागा हुआ भी यह उनसे हार्दिक प्रेम रखता है, इस तरह हम दोनों ही दुखी हैं।

हे महाभाग! उन लोगों के अवगुणों को देखकर भी हम दोनों के मन में उनके लिए ममता-जनित आकर्षण उत्पन्न हो रहा है। हमारे ज्ञान रहते हुए भी ऎसा क्यों है? अज्ञानी मनुष्यों की तरह हम दोनों में यह मूर्खता क्यों है? महर्षि मेधा ने कहा – विषम मार्ग का ज्ञान सब जन्तुओं को है, सबों के लिए विषय पृथक-पृथक होते हैं, कुछ प्राणी दिन में नहीं देखते और कुछ रात को, परन्तु कई जीव ऎसे हैं जो दिन तथा रात दोनों में देख सकते हैं। यह सत्य है कि मनुष्यों में ज्ञान प्रधान है किंतु केवल मनुष्य ही ज्ञानी नहीं होता, पशु पक्षी आदि भी ज्ञान रखते हैं। जैसे यह पशु पक्षी ज्ञानी हैं, वैसे ही मनुष्यों का ज्ञान है और जो ज्ञान मनुष्यों में वैसे ही पशु पक्षियों में है तथा अन्य बातें भी दोनों में एक जैसी पाई जाती है।

ज्ञान होने पर भी इन पक्षियों की ओर देखो कि अपने भूख से पीड़ित बच्चों की चोंच में कितने प्रेम से अन्न के दाने डालते हैं। हे राजन! ऎसा ही प्रेम मनुष्यों में अपनी संतान के प्रति भी पाया जाता है। लोभ के कारण अपने उपकार का बदला पाने के लिए मनुष्य पुत्रों की इच्छा करते हैं और इस प्रकार मोह के गढ्ढे में गिरा करते हैँ। भगवान श्रीहरि की जो माया है, उसी से यह संसार मोहित हो रहा है। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं क्योंकि वह भगवान विष्णु की योगनिन्द्रा है, यह माया ही तो है जिसके कारण संसार मोह में जकड़ा हुआ है, यही महामाया भगवती देवी ज्ञानियों के चित्त को बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती है और उसी के द्वारा सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति होती है।

यही भगवती देवी प्रसन्न होकर मनुष्य को मुक्ति प्रदान करती है। यही संसार के बन्धन का कारण है तथा सम्पूर्ण ईश्वरों की भी स्वामिनी है। महाराज सुरथ ने पूछा-भगवन! वह देवी कौन सी है, जिसको आप महामाया कहते हैं? हे ब्रह्मन! वह कैसे उत्पन्न हुई और उसका कार्य क्या है? उसके चरित्र कौन-कौन से हैं। प्रभो! उसका जैसा प्रभाव हो, जैसा स्वरूप हो वह सब ही कृपाकर मुझसे कहिये, मैं आपसे सुनना चाहता हूँ। महर्षि मेधा बोले-राजन्! वह देवी तो नित्यस्वरुपा है, उसके द्वारा यह संसार रचा गया है। तब भी उसकी उत्पत्ति अनेक प्रकार से होती है। वह सब आप मुझसे सुनो, वह देवताओ का कार्य सिद्ध करने के लिए प्रकट होती है, उस समय वह उत्पन्न हुई कहलाती है।

संसार को जलमय करके जब भगवान विष्णु योगनिद्रा का आश्रय लेकर शेषशैय्या पर सो रहे थे तब मधु-कैटभ नाम के दो असुर उनके कानों के मैल से प्रकट हुए और वह श्रीब्रह्मा जी को मारने के लिए तैयार हो गये। श्रीब्रह्माजी ने जब उन दोनो को अपनी ओर आते देखा और यह भी देखा कि भगवान विष्णु योगनिद्रा का आश्रय लेकर सो रहे हैं तो वह उस समय श्रीभगवान को जगाने के लिये उनके नेत्रों में निवास करने वाली योगनिद्रा की स्तुति करने लगे। श्रीब्रह्मा जी ने कहा-हे देवी! तुम ही स्वाहा, तुम ही स्वधा और तुम ही वषटकार हो। स्वर भी तुम्हारा ही स्वरुप है, तुम ही जीवन देने वाली सुधा हो।

नित्य अक्षर प्रणव में अकार, उकार, मकार इन तीनों में माताओं के रुप में तुम ही स्थित हो। इनके अतिरिक्त जो बिन्दपथ अर्धमात्रा है, जिसका कि विशेष रूप से उच्चारण नहीं किया जाता है, हे देवी! वह भी तुम ही हो। हे देवी! संध्या, सावित्री तथा परमजननी तुम ही हो। तुम इस विश्व को धारण करने वाली हो, तुमने ही इस जगत की रचना की है और तुम ही इस जगत का पालन करने वाली हो। तुम ही कल्प के अन्त में सबको भक्षण करने वाली हो। हे देवी! जगत की उत्पत्ति के समय तुम सृष्टि रूपा होती हो, पालन काल में स्थित रूपा हो और कल्प के अन्त में संहाररूप धारण कर लेती हो। तुम ही महाविद्या, महामाया, महामेधा, महारात्रि और मोहरात्रि हो। श्री ईश्वरी और बोधस्वरूपा बुद्धि भी तुम ही हो, लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम ही हो।

तुम खड्ग धारिणी, शूल धारिणी घोररूपा तथा गदा, चक्र, शंख और धनुष को धारण करने वाली हो। बाण, भुशुण्डी और परिघ यह भी तुम्हारे ही अस्त्र हैं। तुम सौम्य और सौम्यतर हो-यही नहीं बल्कि जितनी भी सौम्य तथा सुन्दर वस्तुएँ इस संसार में हैं, उन सबसे बढ़कर सुन्दर तुम हो। पर और अपर सबसे पर रहने वाली सुन्दर तुम ही हो। हे सर्वस्वरुपे देवी! जो भी सअसत पदार्थ हैं और उनमें जो शक्ति है, वह तुम ही हो। ऎसी अवस्था में भला तुम्हारी स्तुति कौन कर सकता है! इस संसार की सृष्टि, पालन और संहार करने वाले जो भगवान हैं, उनको भी जब तुमने निद्रा के वशीभूत कर दिया है तो फिर तुम्हारी स्तुति कौन कर सकता है? मुझे, भगवान विष्णु तथा भगवान शंकर को शरीर धारण कराने वाली तुम ही हो। तुम्हारी स्तुति करने की शक्ति किसमें में है?

हे देवी! तुम तो अपने इन उदार प्रभावों के कारण ही प्रशंसनीय हो। मधु और कैटभ जो भयंकर असुर है इन्हें मोह में डाल दो और श्रीहरि भगवान विष्णु को भी जल्दी जगा दो और उनमें इनको मार डालने की बुद्धि भी उत्पन्न कर दो। महर्षि मेधा बोले-हे राजन्! जब श्रीब्रह्माजी ने देवी से इस प्रकार स्तुति करके भगवान को जगाने तथा मधु और कैटभ को मारने के लिए कहा तो वह भगवान श्रीविष्णु के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु, हृदय और वक्षस्थल से निकल ब्रह्माजी के सामने खड़ी हो गई। उनका ऎसा करना था कि भगवान श्रीहरि तुरन्त जाग उठे और दोनो असुरों को देखा, जो कि अत्यन्त बलवान तथा पराक्रमी थे और मारे क्रोध के जिनके नेत्र लाल हो रहे थे और जो ब्रह्माजी का वध करने के लिए तैयार थे, तब क्रुद्ध हो उन दोनो दुरात्मा असुरों के साथ भगवान श्रीहरि पूरे पाँच हजार वर्ष तक लड़ते रहे।

एक तो वह अत्यन्त बलवान तथा पराक्रमी थे दूसरे महामाया ने भी उन्हें मोह में डाल रखा था। अत: वह श्री भगवान से कहने लगे-हम दोनो तुम्हारी वीरता से अत्यन्त प्रसन्न है, तुम हमसे कोई वर माँगो! भगवान ने कहा-यदि तुम मुझ पर प्रसन्न हो तो अब तुम मेरे हाथों से मर जाओ। बस इतना सा ही वर मैं तुमसे माँगता हूँ। यहाँ दूसरे वर से क्या प्रयोजन है। महर्षि मेधा बोले-इस तरह से जब वह धोखे में आ गये और अपने चारों ओर जल ही जल देखा तो भगवान श्रीहरि से कहने लगे-जहाँ पर जल न हो, सूखी जमीन हो, उसी जगह हमारा वध कीजिए। महर्षि मेधा कहते है, तथास्तु कहकर भगवान श्रीहरि ने उन दोनों को अपनी जाँघ पर लिटाकर उन दोनो के सिर काट डाले। इस तरह से यह देवी श्रीब्रह्माजी के स्तुति करने पर प्रकट हुई थी, अब तुम से उनके प्रभाव का वर्णन करता हूँ, सो सुनो।


क्रमशः

मंगलवार, 11 अगस्त 2020

तुलसीदासरचित हनुमान साठिका

 बजरंगबली हनुमान साठिका






जय जय जय हनुमान अडंगी । महावीर विक्रम बजरंगी ॥

जय कपीश जय पवन कुमारा । जय जगबन्दन सील अगारा ॥

जय आदित्य अमर अबिकारी । अरि मरदन जय-जय गिरधारी ॥

अंजनि उदर जन्म तुम लीन्हा । जय-जयकार देवतन कीन्हा ॥

बाजे दुन्दुभि गगन गम्भीरा । सुर मन हर्ष असुर मन पीरा ॥

कपि के डर गढ़ लंक सकानी । छूटे बंध देवतन जानी ॥

ऋषि समूह निकट चलि आये । पवन तनय के पद सिर नाये ॥

बार-बार अस्तुति करि नाना । निर्मल नाम धरा हनुमाना ॥

सकल ऋषिन मिलि अस मत ठाना । दीन्ह बताय लाल फल खाना ॥

सुनत बचन कपि मन हर्षाना । रवि रथ उदय लाल फल जाना ॥

रथ समेत कपि कीन्ह अहारा । सूर्य बिना भए अति अंधियारा ॥

विनय तुम्हार करै अकुलाना । तब कपीस की अस्तुति ठाना ॥

सकल लोक वृतान्त सुनावा । चतुरानन तब रवि उगिलावा ॥

कहा बहोरि सुनहु बलसीला । रामचन्द्र करिहैं बहु लीला ॥

तब तुम उन्हकर करेहू सहाई । अबहिं बसहु कानन में जाई ॥

असकहि विधि निजलोक सिधारा । मिले सखा संग पवन कुमारा ॥

खेलैं खेल महा तरु तोरैं । ढेर करैं बहु पर्वत फोरैं ॥

जेहि गिरि चरण देहि कपि धाई । गिरि समेत पातालहिं जाई ॥

कपि सुग्रीव बालि की त्रासा । निरखति रहे राम मगु आसा ॥

मिले राम तहं पवन कुमारा । अति आनन्द सप्रेम दुलारा ॥

मनि मुंदरी रघुपति सों पाई । सीता खोज चले सिरु नाई ॥

सतयोजन जलनिधि विस्तारा । अगम अपार देवतन हारा ॥

जिमि सर गोखुर सरिस कपीसा । लांघि गये कपि कहि जगदीशा ॥

सीता चरण सीस तिन्ह नाये । अजर अमर के आसिस पाये ॥

रहे दनुज उपवन रखवारी । एक से एक महाभट भारी ॥

तिन्हैं मारि पुनि कहेउ कपीसा । दहेउ लंक कोप्यो भुज बीसा ॥

सिया बोध दै पुनि फिर आये । रामचन्द्र के पद सिर नाये।
मेरु उपारि आप छिन माहीं । बांधे सेतु निमिष इक मांहीं ॥

लछमन शक्ति लागी उर जबहीं । राम बुलाय कहा पुनि तबहीं ॥

भवन समेत सुषेन लै आये । तुरत सजीवन को पुनि धाये ॥

मग महं कालनेमि कहं मारा । अमित सुभट निसिचर संहारा ॥

आनि संजीवन गिरि समेता । धरि दीन्हों जहं कृपा निकेता ॥

फनपति केर सोक हरि लीन्हा । वर्षि सुमन सुर जय जय कीन्हा ॥

अहिरावण हरि अनुज समेता । लै गयो तहां पाताल निकेता ॥

जहां रहे देवि अस्थाना । दीन चहै बलि काढ़ि कृपाना ॥

पवनतनय प्रभु कीन गुहारी । कटक समेत निसाचर मारी ॥

रीछ कीसपति सबै बहोरी । राम लषन कीने यक ठोरी ॥

सब देवतन की बन्दि छुड़ाये । सो कीरति मुनि नारद गाये ॥

अछयकुमार दनुज बलवाना । कालकेतु कहं सब जग जाना ॥

कुम्भकरण रावण का भाई । ताहि निपात कीन्ह कपिराई ॥

मेघनाद पर शक्ति मारा । पवन तनय तब सो बरियारा ॥

रहा तनय नारान्तक जाना । पल में हते ताहि हनुमाना ॥

जहं लगि भान दनुज कर पावा । पवन तनय सब मारि नसावा।
जय मारुत सुत जय अनुकूला । नाम कृसानु सोक सम तूला ॥

जहं जीवन के संकट होई । रवि तम सम सो संकट खोई ॥

बन्दि परै सुमिरै हनुमाना । संकट कटै धरै जो ध्याना ॥

जाको बांध बामपद दीन्हा । मारुत सुत व्याकुल बहु कीन्हा ॥

सो भुजबल का कीन कृपाला । अच्छत तुम्हें मोर यह हाला ॥

आरत हरन नाम हनुमाना । सादर सुरपति कीन बखाना ॥

संकट रहै न एक रती को । ध्यान धरै हनुमान जती को ॥

धावहु देखि दीनता मोरी । कहौं पवनसुत जुगकर जोरी ॥

कपिपति बेगि अनुग्रह करहु । आतुर आइ दुसै दुख हरहु ॥

राम सपथ मैं तुमहिं सुनाया । जवन गुहार लाग सिय जाया ॥

यश तुम्हार सकल जग जाना । भव बन्धन भंजन हनुमाना ॥

यह बन्धन कर केतिक बाता । नाम तुम्हार जगत सुखदाता ॥

करौ कृपा जय जय जग स्वामी । बार अनेक नमामि नमामी ॥

भौमवार कर होम विधाना । धूप दीप नैवेद्य सुजाना ॥

मंगल दायक को लौ लावे । सुन नर मुनि वांछित फल पावे ॥

जयति जयति जय जय जग स्वामी । समरथ पुरुष सुअन्तरजामी ॥

अंजनि तनय नाम हनुमाना । सो तुलसी के प्राण समाना ॥

। दोहा ।
जय कपीस सुग्रीव तुम, जय अंगद हनुमान ॥

राम लषन सीता सहित, सदा करो कल्याण ॥

बन्दौं हनुमत नाम यह, भौमवार परमान ॥

ध्यान धरै नर निश्चय, पावै पद कल्याण ॥

जो नित पढ़ै यह साठिका, तुलसी कहैं बिचारि ।
रहै न संकट ताहि को, साक्षी हैं त्रिपुरारि ॥

। सवैया ।
आरत बन पुकारत हौं कपिनाथ सुनो विनती मम भारी ।
अंगद औ नल-नील महाबलि देव सदा बल की बलिहारी ॥

जाम्बवन्त् सुग्रीव पवन-सुत दिबिद मयंद महा भटभारी ।
दुःख दोष हरो तुलसी जन-को श्री द्वादश बीरन की बलिहारी ॥

ॐगोस्वामीतुलसीदासरचित हनुमान साठिकाૐ

दस महाविद्या (DASH MAHAVIDHYA )


उत्पत्ति कथा :

पुराणों अनुसार जब भगवान शिव की पत्नी सती ने दक्ष के यज्ञ में जाना चाहा तब शिवजी ने वहां जाने से मना किया। इस इनकार पर माता ने क्रोधवश पहले काली शक्ति प्रकट की फिर दसों दिशाओं में दस शक्तियां प्रकट कर अपनी शक्ति की झलक दिखला दी। इस अति भयंकरकारी दृश्य को देखकर शिवजी घबरा गए। क्रोध में सती ने शिव को अपना फैसला सुना दिया, 'मैं दक्ष यज्ञ में जाऊंगी ही। या तो उसमें अपना हिस्सा लूंगी या उसका विध्वंस कर दूंगी।'

हारकर शिवजी सती के सामने आ खड़े हुए। उन्होंने सती से पूछा- 'कौन हैं ये?' सती ने बताया,‘ये मेरे दस रूप हैं। आपके सामने खड़ी कृष्ण रंग की काली हैं, आपके ऊपर नीले रंग की तारा हैं। पश्चिम में छिन्नमस्ता, बाएं भुवनेश्वरी, पीठ के पीछे बगलामुखी, पूर्व-दक्षिण में धूमावती, दक्षिण-पश्चिम में त्रिपुर सुंदरी, पश्चिम-उत्तर में मातंगी तथा उत्तर-पूर्व में षोड़शी हैं और मैं खुद भैरवी रूप में अभयदान देने के लिए आपके सामने खड़ी हूं।' यही दस महाविद्या अर्थात् दस शक्ति है। बाद में मां ने अपनी इन्हीं शक्तियां का उपयोग दैत्यों और राक्षसों का वध करने के लिए किया था।

शाक्त भक्तों के अनुसार "दस रूपों में समाहित दस महाविद्याओ की व्याख्या है - महाविद्या" जिससे जगदम्बा के दस लौकिक व्यक्तित्वों की व्याख्या होती है। महाविद्याएँ तान्त्रिक प्रकृति की मानी जाती हैं जो निम्न हैं-
  1. काली
  2. तारा (देवी)
  3. छिन्नमस्ता
  4. षोडशी
  5. भुवनेश्वरी
  6. त्रिपुरभैरवी
  7. धूमावती
  8. बगलामुखी
  9. मातंगी
  10. कमला
प्रथम काली

रक्ताsब्धिपोतारूणपद्मसंस्थां पाशांकुशेष्वासशराsसिबाणान् ।
शूलं कपालं दधतीं कराsब्जै रक्तां त्रिनेत्रां प्रणमामि देवीम् ॥


दसमहाविद्याओं में प्रथम स्थान माँ काली का हैं। काली देवी को आद्य महाविद्या भी कहा गया है। भगवती काली का रूप अत्यंत भयंकर है, परन्तु ये देवी अपने भक्तों के हर इच्छाओं को पूर्ण करने वाली, दयामयी हैं। तंत्र ग्रंथों में भगवती महाकाली के अनेको रूपों का वर्णन किया गया है एवं अनेकों साधना विधान बताये गए हैं, परन्तु तंत्र का अनुसरण और तांत्रिक साधनाएँ अत्यंत दुरूह एवं प्राणघातक भी हैं। माँ महाकाली में अनन्य भक्ति एवं अटूट विश्वास रखकर कोई भी मनुष्य उनकी कृपा प्राप्त कर सकता है। काली देवी की साधना हर प्रकार के मनोकामनाओं की पूर्ति एवं मोक्ष प्राप्ति के लिए की जाती है।

तारा

मातर्तीलसरस्वती प्रणमतां सौभाग्य-सम्पत्प्रदे प्रत्यालीढ –पदस्थिते शवह्यदि स्मेराननाम्भारुदे ।
फुल्लेन्दीवरलोचने त्रिनयने कर्त्रो कपालोत्पले खड्गञ्चादधती त्वमेव शरणं त्वामीश्वरीमाश्रये ॥



हिन्दू धर्म में तारा दस महाविद्याओं में से द्वितीय महाविद्या हैं। 'तारा' का अर्थ है, 'तारने वाली'। ये शक्ति की स्वरूप हैं।

तारा देवी मुख्य रूप से महाकाली का सोम्य रूप है जिसमे असीम ममता छिपी है।

छिन्नमस्ता

नाभौ शुद्धसरोजवक्त्रविलसद्बांधुकपुष्पारुणं भास्वद्भास्करमणडलं तदुदरे तद्योनिचक्रं महत् ।
तन्मध्ये विपरीतमैथुनरतप्रद्युम्नसत्कामिनी पृष्ठस्थां तरुणार्ककोटिविलसत्तेज: स्वरुपां भजे ॥

छिन्नमस्ता या 'छिन्नमस्तिका' या 'प्रचण्ड चण्डिका' दस महाविद्यायों में से एक हैं। छिन्नमस्ता देवी के हाथ में अपना ही कटा हुआ सिर है तथा दूसरे हाथ में कटार है।छिन्नमस्ता सकल चिंता का अंत करती है। इसलिए उन्हे चिंतपुरनी भी कहा जाता है।आद्या शक्ति अपने स्वरूप का वर्णन करते हुए कहती हैं कि मैं छिन्न शीश अवश्य हूं लेकिन अन्न के आगमन के रूप सिर के सन्धान (सिर के लगे रहने) से यज्ञ के रूप में प्रतिष्ठित हूं। जब सिर संधान रूप अन्न का आगमन बंद हो जाएगा तब उस समय मैं छिन्नमस्ता ही रह जाती हूं। इस महाविद्या का संबंध महाप्रलय से है। महाप्रलय का ज्ञान कराने वाली यह महाविद्या भगवती त्रिपुरसुंदरी का ही रौद्र रूप है। सुप्रसिद्ध पौराणिक हयग्रीवोपाख्यान का (जिसमें गणपति वाहन मूषक की कृपा से धनुष प्रत्यंचा भंग हो जाने के कारण सोते हुए विष्णु के सिर के कट जाने का निरूपण है) इसी छिन्नमस्ता से संबद्ध है।शिव शक्ति के विपरीत रति आलिंगन पर आप स्थित हैं। आप एक हाथ में खड्ग और दूसरे हाथ में मस्तक धारण किए हुए हैं। अपने कटे हुए स्कन्ध से रक्त की जो धाराएं निकलती हैं, उनमें से एक को स्वयं पीती हैं और अन्य दो धाराओं से अपनी वर्णिनी और शाकिनी नाम की दो सहेलियों को तृप्त कर रही हैं। इडा, पिंगला और सुषमा इन तीन नाडियों का संधान कर योग मार्ग में सिद्धि को प्रशस्त करती हैं। विद्यात्रयी में यह दूसरी विद्या गिनी जाती हैं।देवी के गले में हड्डियों की माला तथा कन्धे पर यज्ञोपवीत है। इसलिए शांत भाव से इनकी उपासना करने पर यह अपने शांत स्वरूप को प्रकट करती हैं। उग्र रूप में उपासना करने पर यह उग्र रूप में दर्शन देती हैं जिससे साधक के उच्चाटन होने का भय रहता है। दिशाएं ही इनके वस्त्र हैं। इनकी नाभि में योनि चक्र है। छिन्नमस्ता की साधना दीपावली से शुरू करनी चाहिए। इस मंत्र के चार लाख जप करने पर देवी सिद्ध होकर कृपा करती हैं। जप का दशांश हवन, हवन का दशांश तर्पण, तर्पण का दशांश मार्जन और मार्जन का दशांश ब्राह्मण और कन्या भोजन करना चाहिए।

षोडषी

बालव्यक्तविभाकरामितनिभां भव्यप्रदां भारतीम् ईषत्फल्लमुखाम्बुजस्मितकरैराशाभवान्धापहाम् ।
पाशं साभयमङ्कुशं च ‍वरदं संविभ्रतीं भूतिदा ।भ्राजन्तीं चतुरम्बजाकृतिकरैभक्त्या भजे षोडशीम् ॥


त्रिपुरासुन्दरी दस महाविद्याओं (दस देवियों) में से एक हैं। इन्हें 'महात्रिपुरसुन्दरी', षोडशी, ललिता, लीलावती, लीलामती, ललिताम्बिका, लीलेशी, लीलेश्वरी, तथा राजराजेश्वरी भी कहते हैं। वे दस महाविद्याओं में सबसे प्रमुख देवी हैं।

भुवनेश्वरी

उद्यद्दिनद्युतिमिन्दुकिरीटां तुंगकुचां नयनवययुक्ताम् ।
स्मेरमुखीं वरदाङ्कुश पाशभीतिकरां प्रभजे भुवनेशीम् ॥


भुवनेश्वरी के स्वरूप,
आयुध, आसन आदि का संक्षेप में-विवेचन इस तरह है-- भुवनेश्वरी के एक मुख, चार हाथ हैं। चार हाथों में गदा-शक्ति का एवं राजंदंड-व्यवस्था का प्रतीक है। माला-नियमितता एवं आशीर्वाद मुद्रा-प्रजापालन की भावना का प्रतीक है। आसन-शासनपीठ-सवोर्च्च सत्ता की प्रतीक है।



भुवनेश्वरी अर्थात संसार भर के ऐश्वयर् की स्वामिनी। भुवनेश्वरी आदि शक्ति का पंचम स्वरूप है जिस रूप में इनहोने त्रिदेवो को दर्शन दिये दिये थे। देवी भागवत में इस बात का स्पष्टीकरण मिलता है।

भुवनेश्वरी इससे ऊँची स्थिति है। उसमें सृष्टि भर का ऐश्वर्य अपने अधिकार में आया प्रतीत होता है। मां भुवनेश्वरी ही शताक्षी और शाकंभरी देवी के नाम से विख्यात हुई। वैभव उपाजर्न के लिए भौतिक पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। ऐश्वर्य की उपलब्धि भी आत्मिक पुरुषार्थ से ही संभव है। व्यापक ऐश्वयर् की अनुभूति तथा सामथ्यर् प्राप्त करने के लिए साधनात्मक पुरुषाथर् करने पड़ते है। गायत्री उपासना में इस स्तर की साधना जिस विधि-विधान के अन्तगर्त की जाती है उसे 'भुवनेश्वरी' कहते है।



त्रिपुरभैरवी

उद्यद्भानुसहस्रकान्तिमरुणक्षौमां शिरोमालिकां रक्तालिप्तपयोधरां जपपटीं विद्यामभीतिं वरम् ।

हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्दश्रियं देवीं बद्धहिमांशुरत्नमुकुटां वन्दे समन्दस्मिताम् ॥


त्रिपुरभैरवी के स्वरूप
त्रिपुरसुन्दरी के चार कर दर्शाए गए हैं। चारों हाथों में पाश, अंकुश, धनुष और बाण सुशोभित हैं।
देवीभागवत में ये कहा गया है वर देने के लिए सदा-सर्वदा तत्पर भगवती मां का श्रीविग्रह सौम्य और हृदय दया से पूर्ण है। जो इनका आश्रय लेते है, उन्हें इनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। इनकी महिमा अवर्णनीय है। संसार के समस्त तंत्र-मंत्र इनकी आराधना करते हैं। प्रसन्न होने पर ये भक्तों को अमूल्य निधियां प्रदान कर देती हैं। दिशाओं में चार और एक ऊपर की ओर मुख होने से इन्हें तंत्र शास्त्रों में ‘पंचवक्त्र’ अर्थात् पांच मुखों वाली कहा गया है। आप सोलह कलाओं से परिपूर्ण हैं, इसलिए इनका नाम ‘षोडशी’ भी है। बार पार्वती जी ने भगवान शिवजी से पूछा, ‘भगवन! आपके द्वारा वर्णित तंत्र शास्त्र की साधना से जीव के आधि-व्याधि, शोक संताप, दीनता-हीनता तो दूर हो जाएगी, किन्तु गर्भवास और मरण के असह्य दुख की निवृत्ति और मोक्ष पद की प्राप्ति का कोई सरल उपाय बताइये।’ तब पार्वती जी के अनुरोध पर भगवान शिव ने त्रिपुर सुन्दरी श्रीविद्या साधना-प्रणाली को प्रकट किया।भैरवयामल और शक्तिलहरी में त्रिपुर सुन्दरी उपासना का विस्तृत वर्णन मिलता है। ऋषि दुर्वासा आपके परम आराधक थे। इनकी उपासना श्री चक्र में होती है। आदिगुरू शंकरचार्य ने भी अपने ग्रन्थ सौन्दर्यलहरी में त्रिपुर सुन्दरी श्रीविद्या की बड़ी सरस स्तुति की है। कहा जाता है- भगवती त्रिपुर सुन्दरी के आशीर्वाद से साधक को भोग और मोक्ष दोनों सहज उपलब्ध हो जाते हैं।
त्रिपुरसुन्दरी, काली का रक्तवर्णा रूप हैं। काली के दो रूप कृष्णवर्णा और रक्तवर्णा हैं। त्रिपुर सुंदरी धन, ऐश्वर्य, भोग और मोक्ष की अधिष्ठात्री देवी हैं। इससे पहले की महाविद्याओं में कोई भोग तो कोई मोक्ष में विशेष प्रभावी हैं लेकिन यह देवी समान रूप से दोनों ही प्रदान करती हैं।
त्रिपुर रहस्य के अनुसार माना जाता है की त्रिपुर सुंदरी ने ही सर्वप्रथम महालक्ष्मी, फिर महालक्ष्मी से महासरस्वती और महाकाली को उत्पन्न किया।
त्रिपुरभैरवी दशमहाविद्याओं में से एक मानी जाती है। इन देवी को ग्राम रक्षणी भी कहा जाता है, यह देवी सम्पूर्ण सृष्टि को धारण करने में सक्षम है। शक्ति की महाविद्या भय का नाश करती है।


धूमावती

प्रातर्यास्यात्कमारी कुसुमकलिकया जापमाला जयन्ती मध्याह्रेप्रौढरूपा विकसितवदना चारुनेत्रा निशायाम्
सन्ध्यायां वृद्धरूपा गलितकुचयुगा मुण्डमालां वहन्ती सा देवी देवदेवी त्रिभुवनजननी कालोका पातु युष्मान्

धूमावती पार्वती का एक रूप हैं।
धूमन अर्थात प्रदूषण और आवती अर्थात प्रकृति। यह शक्ति की वह व्यवस्था जब सृष्टि के अंत के लिए देवी प्रदूषण का प्रयोग करती है। इस स्वरूप में देवी सृष्टि की सकारात्मक स्रोत को अपने में समाहित कर अस्थायी सृष्टि का अंत कर देती है।
इस रूप में उन्हें बहुत भूख लगी और उन्होंने महादेव से कुछ खाने को माँगा। महादेव ने थोड़ा ठहरने के लिये कहा। पर पार्वती क्षुधा से अत्यंत आतुर होकर महादेव को निगल गई। महादेव को निगलने पर सृष्टि में प्रदूषण रूपी धूम्र फैल गया।
बँगलामुखी

मध्ये सुधाब्धि – मणि मण्डप – रत्नवेद्यां सिंहासनोपरिगतां परिपीतवर्णाम् ।
पीताम्बराभरण – माल्य – बिभूतिषताङ्गी देवीं स्मरामि धृत-मुद्गर वैरिजिह्वाम् ॥

माता बगलामुखी दस महाविद्याओं में आठवीं महाविद्या हैं। इन्हें माता पीताम्बरा भी कहते हैं। ये स्तम्भन की देवी हैं। सम्पूर्ण सृष्टि में जो भी तरंग है वो इन्हीं की वजह से है।
स्वरुप :
नवयौवना हैं और पीले रंग की सा‌‌ङी धारण करती हैं । सोने के सिंहासन पर विराजती हैं । तीन नेत्र और चार हाथ हैं । सिर पर सोने का मुकुट है । स्वर्ण आभूषणों से अलंकृत हैं । शरीर पतला और सुंदर है । रंग गोरा और स्वर्ण जैसी कांति है । सुमुखी हैं । मुख मंडल अत्यंत सुंदर है जिस पर मुस्कान छाई रहती है जो मन को मोह लेता है ।

सारे ब्रह्माण्ड की शक्ति मिल कर भी इनका मुकाबला नहीं कर सकती। शत्रुनाश, वाकसिद्धि, वाद विवाद में विजय के लिए इनकी उपासना की जाती है। इनकी उपासना से शत्रुओं का स्तम्भन होता है तथा जातक का जीवन निष्कंटक हो जाता है। किसी छोटे कार्य के लिए १०००० तथा असाध्य से लगाने वाले कार्य के लिए एक लाख मंत्र का जाप करना चाहिए। बगलामुखी मंत्र के जाप से पूर्व बगलामुखी कवच का पाठ अवश्य करना चाहिए।
व्यष्ठि रूप में शत्रुओ को नष्ट करने की इच्छा रखने वाली तथा समिष्टि रूप में परमात्मा की संहार शक्ति ही बगला है। पिताम्बराविद्या के नाम विख्यात बगलामुखी की साधना प्रायः शत्रुभय से मुक्ति और वाकसिद्धि के लिये की जाती है। इनकी उपासना में हल्दी की माला, पीले फूल और पीले वस्त्रो का विधान है। माहविद्याओं में इनका स्थान आठवाँ है। द्वी भुज चित्रण ज्यादा आम है और सौम्या या मामूली फार्म के रूप में वर्णित है। वह उसके दाहिने हाथ में एक गदा जिसके साथ वह एक राक्षस धड़क रहा है, जबकि उसके बाएं हाथ के साथ अपनी जीभ बाहर खींच रखती है। इस छवि को कभी कभी स्तम्भन अचेत करने के लिए शक्ति या चुप्पी में एक दुश्मन को पंगु बना एक प्रदर्शनी के रूप में व्याख्या की है। यह एक बून्स बगलामुखी भक्तों जिसके लिए उसकी पूजा करता है। अन्य महाविद्या देवी भी दुश्मन को हराने के लिए विभिन्न अनुष्ठानों के माध्यम से अपने भक्तों द्वारा लागू किया जा करने के लिए उपयोगी के लिए इसी तरह की शक्तियों का प्रतिनिधित्व करने के लिए कहा जाता है। बगलामुखी ,पीताम्बर या ब्रह्मास्त्र रुपणी भी कहा जाता है और वह इसके विपरीत हर बात में बदल जाता है। वह चुप्पी में भाषण बदल जाता है, नपुंसकता में अज्ञानता में, ज्ञान शक्ति, जीत में हार. वह ज्ञान है जिससे हर बात समय में इसके विपरीत हो जाना चाहिए का प्रतिनिधित्व करता है। द्वंद्व के बीच अभी भी बिंदु के रूप में वह हमें उन्हें मास्टर करने के लिए अनुमति देता है। सफलता में छिपा विफलता देखने के लिए, मृत्यु जीवन में छिपा हुआ है, या खुशी गम में छिपा उसकी सच्चाई से संपर्क करने के तरीके हैं। बगलामुखी विपरीत जिसमें हर बात वापस अजन्मे और अज में भंग कर रहा है के रहस्य उपस्थिति है।

कथा-सतयुग में सम्पूर्ण जगत को नष्ट करने वाला भयंकर तूफान आया। प्राणियो के जीवन पर संकट को देख कर भगवान विष्णु चिंतित हो गये। वे सौराष्ट्र देश में हरिद्रा सरोवर के समीप जाकर भगवती को प्रसन्न करने के लिये तप करने लगे। श्रीविद्या ने उस सरोवर से वगलामुखी रूप में प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिया तथा विध्वंसकारी तूफान का तुरंत स्तम्भन कर दिया। बगलामुखी महाविद्या भगवान विष्णु के तेज से युक्त होने के कारण वैष्णवी है। मंगलयुक्त चतुर्दशी की अर्धरात्रि में इसका प्रादुर्भाव हुआ था। श्री बगलामुखी को ब्रह्मास्त्र के नाम से भी जाना जाता है.

मातंगी

श्यामां शुभ्रांशुभालां त्रिकमलनयनां रत्नसिंहासनस्थां भक्ताभीष्टप्रदात्रीं सुरनिकरकरासेव्यकंजांयुग्माम् ।
निलाम्भोजांशुकान्ति निशिचरनिकारारण्यदावाग्निरूपां पाशं खङ्गं चतुर्भिर्वरकमलकै: खेदकं चाङ्कुशं च ॥

मतंग शिव का नाम है। इनकी शक्ति मातंगी है। यह श्याम वर्ण और चन्द्रमा को मस्तक पर धारण करती हैं। यह पूर्णतया वाग्देवी की ही पूर्ति हैं। चार भुजाएं चार वेद हैं। मां मातंगी वैदिकों की सरस्वती हैं। पलास और मल्लिका पुष्पों से युक्त बेलपत्रों की पूजा करने से व्यक्ति के अंदर आकर्षण और स्तम्भन शक्ति का विकास होता है। ऐसा व्यक्ति जो मातंगी महाविद्या की सिद्धि प्राप्त करेगा, वह अपने क्रीड़ा कौशल से या कला संगीत से दुनिया को अपने वश में कर लेता है। वशीकरण में भी यह महाविद्या कारगर होती है। हिन्दू धर्म के अनुसार मातंगी ही एक ऐसी देवी है जिन्हें जूठन का बुक लगा लगाया जाता है ऐसा कहते हैं कि मातंगी देवी को झूठा किये बिना भूख नहीं लगता है । मातंगी देवी समता का सूचक है ।


कमला 

त्रैलोक्यपूजिते देवि कमले विष्णुबल्लभे ।
यथा त्वमचल कृष्णे तथा भव मयि स्थिरा ॥

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