शुक्रवार, 21 अगस्त 2020

अष्टावक्रगीता प्रथम प्रकरण Ashtavakr geeta pratham prakaran

॥ श्रीः ॥ 


अष्टावक्रगीता


प्रथम प्रकरण


कथं ज्ञानमवाप्नोति कथं मुक्तिर्भविष्यति ।

वैराग्यं च कथं प्राप्तमेतद्ब्रूहि मम प्रभो॥१॥

वयोवृद्ध राजा जनक, बालक अष्टावक्र से पूछते हैं - हे प्रभु, ज्ञान की प्राप्ति कैसे होती है, मुक्ति कैसे प्राप्त होती है, वैराग्य कैसे प्राप्त किया जाता है, ये सब मुझे बताएं॥१॥

अष्टावक्र उवाच

मुक्तिमिच्छसिचेत्तात विषयान्विषवत्त्यज।

क्षमार्जवदयातोषसत्यं पीयूषवद्भज ॥२॥ 

श्री अष्टावक्र उत्तर देते हैं - यदि आप मुक्ति चाहते हैं तो अपने मन से विषयों (वस्तुओं के उपभोग की इच्छा) को विष की तरह त्याग दीजिये। क्षमा, सरलता, दया, संतोष तथा सत्य का अमृत की तरह सेवन कीजिये॥२॥

न पृथ्वी न जलं नाग्निर्न वायुर्द्यौर्न वा भवान् । 

एषां साक्षिणमात्मानं चिद्रूपं विद्धि मुक्तये ॥३॥

आप न पृथ्वी हैं, न जल, न अग्नि, न वायु अथवा आकाश ही हैं। मुक्ति के लिए इन तत्त्वों के साक्षी, चैतन्यरूप आत्मा को जानिए॥३॥

यदि देहं पृथक्कृत्य चिति विश्राम्य तिष्ठसि ।

अधुनैव सुखी शान्तो बंधमुक्तो भविष्यसि ॥ ४ ॥

यदि आप स्वयं को इस शरीर से अलग करके, चेतना में विश्राम करें तो तत्काल ही सुख, शांति और बंधन मुक्त अवस्था को प्राप्त होंगे॥४॥

न त्वं विप्रादि को वर्णों नाश्रमी नाक्षगोचरः।

असंगोसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव ॥५॥

आप ब्राह्मण आदि सभी जातियों अथवा ब्रह्मचर्य आदि सभी आश्रमों से परे हैं तथा आँखों से दिखाई न पड़ने वाले हैं  आप निर्लिप्त, निराकार और इस विश्व के साक्षी हैं, ऐसा जान कर सुखी हो जाएँ   

धर्माधर्मौ सुखं दुःखं मानसानि न ते विभो।

न कर्तासि न भोक्तासि मुक्त एवासि सर्वदा ॥ ६ ॥

धर्म, अधर्म, सुख, दुःख मस्तिष्क से जुड़ें हैं, सर्वव्यापक आप से नहीं। न आप करने वाले हैं और न भोगने वाले हैं, आप सदा मुक्त ही हैं 

एको द्रष्टासि सर्वस्य मुक्तप्रायोऽसि सर्वदा।

अयमेव हिते बन्धो द्रष्टारं पश्यसीतरम् ॥७॥

आप समस्त विश्व के एकमात्र दृष्टा हैं, सदा मुक्त ही हैं, आप का बंधन केवल इतना है कि आप दृष्टा किसी और को समझते हैं   

अहं कतैत्यहमानमहाकृष्णाहिदंशितः।

नाहं कर्तेति विश्वासामृतं पीत्वा सुखी भव॥८॥

अहंकार रूपी महासर्प के प्रभाववश आप 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मान लेते हैं । 'मैं कर्ता नहीं हूँ', इस विश्वास रूपी अमृत को पीकर सुखी हो जाइये   

एको विशुद्धबोधोऽहमिति निश्चयवह्निना।

प्रज्वाल्याज्ञानगहनं वीतशोकःसुखी भव॥९॥

मैं एक, विशुद्ध ज्ञान हूँ, इस निश्चय रूपी अग्नि से गहन अज्ञान वन को जला दें, इस प्रकार शोकरहित होकर सुखी हो जाएँ    

यत्र विश्वमिदं भाति कल्पितं रज्जुसर्पवत् ।

आनन्दपरमानन्दःस बोधस्त्वं सुखंचर ॥ १० ॥

 जहाँ ये विश्व रस्सी में सर्प की तरह अवास्तविक लगे, उस आनंद, परम आनंद की अनुभूति करके सुख से रहें    

                                मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्यपि ।

किंवदंतीहसत्येयं या मतिःसा गतिर्भवेत् ॥ ११ ॥

स्वयं को मुक्त मानने वाला मुक्त ही है और बद्ध मानने वाला बंधा हुआ ही है, यह कहावत सत्य ही है कि जैसी बुद्धि होती है वैसी ही गति होती है  ११  


आत्मा साक्षी विभुःपूर्णए को मुक्तश्चिदक्रियः ।

असंगोनिःस्पृहः शान्तोभ्रमात्संसारवानिव॥१२॥

 आत्मा साक्षी, सर्वव्यापी, पूर्ण, एक , मुक्त, चेतन, अक्रिय, असंग, इच्छा रहित एवं शांत है। भ्रम वश ही ये सांसारिक प्रतीत होती है  १२ 

 कूटस्थं बोधमद्वैतमात्मानं परिभावय ।

अभासोहंभ्रमंमुक्त्वाभावंबाह्यमथांतरम् ॥ १३ ॥

 अपरिवर्तनीय, चेतन व अद्वैत आत्मा का चिंतन करें और 'मैं' के भ्रम रूपी आभास से मुक्त होकर, बाह्य विश्व की अपने अन्दर ही भावना करें  १३ 

देहाभिमानपाशेन चिरंबद्दोऽसि पुत्रक।

बोधोऽहं ज्ञानखड्गेन तन्निः कृत्य सुखी भव॥१४॥

हे पुत्र! बहुत समय से आप 'मैं शरीर हूँ' इस भाव बंधन से बंधे हैं, स्वयं को अनुभव कर, ज्ञान रूपी तलवार से इस बंधन को काटकर सुखी हो जाएँ  १४  

निःसंगो निष्क्रियोऽसि तं स्वप्रकाशो निरंजनः ।

अयमेव हि ते बन्धः समाधिमनुतिष्ठसि ॥१५॥

 आप असंग, अक्रिय, स्वयं-प्रकाशवान तथा सर्वथा-दोषमुक्त हैं। आपका ध्यान द्वारा मस्तिस्क को शांत रखने का प्रयत्न ही बंधन है  १५ 

त्वया व्याप्तमिदं विश्वं त्वयि प्रोतं यथार्थतः ।

शुद्धबुद्धस्वरूपस्त्वं मा गमःक्षुद्रचित्तताम्॥१६॥

 यह विश्व तुम्हारे द्वारा व्याप्त किया हुआ है, वास्तव में तुमने इसे व्याप्त किया हुआ है । तुम शुद्ध और ज्ञानस्वरुप हो, छोटेपन की भावना से ग्रस्त मत हो    

निरपेक्षो निर्विकारो निर्भरः शीतलाशयः।

अगाधबुद्धिरक्षुब्धो भव चिन्मात्रवासनः ॥ १७॥

आप इच्छारहित, विकाररहित, घन (ठोस), शीतलता के धाम, अगाध बुद्धिमान हैं, शांत होकर केवल चैतन्य की इच्छा वाले हो जाइये  १७ 

साकारमनृतं विद्धि निराकारंतु निश्चलम्।

एतत्तत्वोपदेशेन न पुनर्भवसम्भवः॥१८॥

आकार को असत्य जानकर निराकार को ही चिर स्थायी मानिये, इस तत्त्व को समझ लेने के बाद पुनः जन्म लेना संभव नहीं है  १८ 

यथैवादर्शमध्यस्थे रूपेऽन्तः परितस्तु सः ।

तथैवास्मिन्शरीरेऽन्तः परितः परमेश्वरः१९॥

 जिस प्रकार दर्पण में प्रतिबिंबित रूप उसके अन्दर भी है और बाहर भी, उसी प्रकार परमात्मा इस शरीर के भीतर भी निवास करता है और उसके बाहर भी  १९ 

                                       एकं सर्वगतं व्योम बहिरंतर्यथा घटे।

                                   नित्यं निरन्तरं ब्रह्म सर्वभूतगणे तथा॥२०॥

जिस प्रकार एक ही आकाश पात्र के भीतर और बाहर व्याप्त है, उसी प्रकार शाश्वत और सतत परमात्मा समस्त प्राणियों में विद्यमान है  २० 

 इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां प्रथम प्रकरणं समाप्तम् ॥ १

 

धन्यवाद 

पातञ्जलयोगसूत्र PATNJALI YOGSUTRA

 पातञ्जलयोगसूत्र



महर्षि पतञ्जलि का योगसूत्र चार पादों या अध्यायों में है। जो कि क्रमशः


1.   समाधिपाद


2.   साधनापाद,


3.   विभूतिपाद 


4.  कैवल्यपाद 


1.  समाधिपाद -

 समाधिपाद में ग्रन्थकर्ता ने सर्वप्रथम ग्रन्थ का उद्देश्य – ‘अथ योगानुशानम्’  के रूप में तथा ‘योग’ की परिभाषा योगश्चित्तवृत्तियों का निरोध है, को देते हुए चित्त वृत्तियों के निरोध से उत्पन्न होने वाली स्थित को समाधि एव दृष्टा(साधक) के स्वरूप की प्राप्ति कहा है। इस समाधि के सबीज एवं निर्बीज आदि विभिन्न स्थितियों की भी चर्चा भी कही गयी है। 


2.  साधनापाद – 

साधनापाद में साधना से अभिप्राय साधन भी है, जिन साधनों या विधियों से समाधि की स्थिति या चित्त वृत्ति के निरोध की स्थिति संभव होगी उनकी चर्चा साधनापाद में संरक्षित है। इसी हेतु योग के आठ अंग या अष्टांग योग- यम, नियम, आसन, प्राणायम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान एवं समाधि में प्रथम पाँच की चर्चा भी यहीं पर की गयी है।


3. विभूतिपाद - 

योगसूत्र का तृतीय पाद या अध्याय है। विभूति से शाब्दिक तात्पर्य वि+भूति या विशेष रूप से हो जाने(स्थिति को प्राप्ति करने) में है। योग साधना की प्रौढ़ता साधक के अन्दर विशिष्ट क्षमतायें उत्पन्न कर देती है जैसे उसकी देह(अस्तित्व) अणु के समान हो सकता है-इसे अणिमा कहा गया है। इसी क्रम में अष्ट सिद्धियों की विवेचना की गयी है।


4.  कैवल्यपाद -

 योगसाधना की पूर्णता कैवल्य या मोक्ष है। यही समाधि की भी चरम अवस्था है। जिसमें साधक अपने चेतन या शुद्धस्वरूप की अनूभूति एवं प्राप्ति करता है।


॥ प्रथमोऽध्यायः ॥ 

 ॥ समाधि-पादः ॥


अथ योगानुशासनम् ॥ १.१॥


योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥ १.२॥


तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥ १.३॥


वृत्तिसारूप्यमितरत्र ॥ १.४॥


वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाऽक्लिष्टाः ॥ १.५॥


प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः ॥ १.६॥


प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ॥ १.७॥


विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ॥ १.८॥


शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ॥ १.९॥


अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा ॥ १.१०॥


अनुभूतविषयासंप्रमोषः स्मृतिः ॥ १.११॥


अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः ॥ १.१२॥


तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः ॥ १.१३॥


स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः ॥ १.१४॥


दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ॥ १.१५॥


तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् ॥ १.१६॥


वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात् संप्रज्ञातः ॥ १.१७॥


विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः ॥ १.१८॥


भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् ॥ १.१९॥


श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् ॥ १.२०॥


तीव्रसंवेगानामासन्नः ॥ १.२१॥


मृदुमध्याधिमात्रत्वात् ततोऽपि विशेषः ॥ १.२२॥


ईश्वरप्रणिधानाद्वा ॥ १.२३॥


क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥ १.२४॥


तत्र निरतिशयं सार्वज्ञबीजम् ॥ १.२५॥


स पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् ॥ १.२६॥


तस्य वाचकः प्रणवः ॥ १.२७॥


तज्जपस्तदर्थभावनम् ॥ १.२८॥


ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च ॥ १.२९॥


व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरति-भ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः ॥ १.३०॥


दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः ॥ १.३१॥


तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः ॥ १.३२॥


मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम् ॥ १.३३॥


प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य ॥ १.३४॥


विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धिनी ॥ १.३५॥


विशोका वा ज्योतिष्मती ॥ १.३६॥


वीतरागविषयं वा चित्तम् ॥ १.३७॥


स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वा ॥ १.३८॥


यथाभिमतध्यानाद्वा ॥ १.३९॥


परमाणु परममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः ॥ १.४०॥


क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनता समापत्तिः ॥ १.४१॥


तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः ॥ १.४२॥


स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का ॥ १.४३॥


एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता ॥ १.४४॥


सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम् ॥ १.४५॥


ता एव सबीजः समाधिः ॥ १.४६॥


निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः ॥ १.४७॥


ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा ॥ १.४८॥


श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात् ॥ १.४९॥


तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी ॥ १.५०॥


तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः ॥ १.५१॥


॥ इति पतञ्जलि-विरचिते योग-सूत्रे प्रथमः समाधि-पादः ॥



॥ द्वितीयोऽध्यायः ॥ 

॥ साधन-पादः ॥


तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ॥ २.१॥


समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च ॥ २.२॥


अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः ॥ २.३॥


अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् ॥ २.४॥


अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या ॥ २.५॥


दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता ॥ २.६॥


सुखानुशयी रागः ॥ २.७॥


दुःखानुशयी द्वेषः ॥ २.८॥


स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः ॥ २.९॥


ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः ॥ २.१०॥


ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः ॥ २.११॥


क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः ॥ २.१२॥


सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः ॥ २.१३॥


ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात् ॥ २.१४॥


परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः ॥ २.१५॥


हेयं दुःखमनागतम् ॥ २.१६॥


द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ॥ २.१७॥


प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम् ॥ २.१८॥


विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि ॥ २.१९॥


द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः ॥ २.२०॥


तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा ॥ २.२१॥


कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात् ॥ २.२२॥


स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः ॥ २.२३॥


तस्य हेतुरविद्या ॥ २.२४॥


तदभावात् संयोगाभावो हानं तद्दृशेः कैवल्यम् ॥ २.२५॥


विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः ॥ २.२६॥


तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा ॥ २.२७॥


योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिरा विवेकख्यातेः ॥ २.२८॥


यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि ॥ २.२९॥


अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः ॥ २.३०॥


जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् ॥ २.३१॥


शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः ॥ २.३२॥


वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् ॥ २.३३॥


वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहपूर्वकामृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् ॥ २.३४॥


अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः ॥ २.३५॥


सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् ॥ २.३६॥


अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ॥ २.३७॥


ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ॥ २.३८॥


अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथंतासम्बोधः ॥ २.३९॥


शौचात् स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः ॥ २.४०॥


सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शन-योग्यत्वानि च ॥ २.४१॥


संतोषादनुत्तमसुखलाभः ॥ २.४२॥


कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात् तपसः ॥ २.४३॥


स्वाध्यायाद् इष्टदेवतासंप्रयोगः ॥ २.४४॥


समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ॥ २.४५॥


स्थिरसुखम् आसनम् ॥ २.४६॥


प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् ॥ २.४७॥


ततो द्वन्द्वानभिघातः ॥ २.४८॥


तस्मिन्सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ॥ २.४९॥


बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः ॥ २.५०॥


बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ॥ २.५१॥


ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ॥ २.५२॥


धारणासु च योग्यता मनसः ॥ २.५३॥


स्वविषयासंप्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः ॥ २.५४॥


ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ॥ २.५५॥


॥ इति पतञ्जलि-विरचिते योग-सूत्रे द्वितीयः साधन-पादः ॥



॥ तृतीयोऽध्यायः ॥ 

॥ विभूति-पादः ॥


देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ॥ ३.१॥


तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ॥ ३.२॥


तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः ॥ ३.३॥


त्रयमेकत्र संयमः ॥ ३.४॥


तज्जयात्प्रज्ञालोकः ॥ ३.५॥


तस्य भूमिषु विनियोगः ॥ ३.६॥


त्रयमन्तरङ्गं पूर्वेभ्यः ॥ ३.७॥


तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य ॥ ३.८॥


व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौनिरोधक्षणचित्तान्वयो निरोधपरिणामः ॥ ३.९॥


तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् ॥ ३.१०॥


सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणामः ॥ ३.११॥


ततः पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रतापरिणामः ॥ ३.१२॥


एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः ॥ ३.१३॥


शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी ॥ ३.१४॥


क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतुः ॥ ३.१५॥


परिणामत्रयसंयमाद् अतीतानागतज्ञानम् ॥ ३.१६॥


शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात् सङ्करस्तत्प्रविभागसंयमात्सर्वभूतरुतज्ञानम् ॥ ३.१७॥


संस्कारसाक्षात्करणात्पूर्वजातिज्ञानम् ॥ ३.१८॥


प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम् ॥ ३.१९॥


न च तत्सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात् ॥ ३.२०॥


कायरूपसंयमात्तद्ग्राह्यशक्तिस्तम्भे चक्षुःप्रकाशासंप्रयोगेऽन्तर्धानम् ॥ ३.२१॥


सोपक्रमं निरुपक्रमं च कर्म तत्संयमादपरान्तज्ञानमरिष्टेभ्यो वा ॥ ३.२२॥


मैत्र्यादिषु बलानि ॥ ३.२३॥


बलेषु हस्तिबलादीनि ॥ ३.२४॥


प्रवृत्त्यालोकन्यासात्सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टज्ञानम् ॥ ३.२५॥


भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात् ॥ ३.२६॥


चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम् ॥ ३.२७॥


ध्रुवे तद्गतिज्ञानम् ॥ ३.२८॥


नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम् ॥ ३.२९॥


कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः ॥ ३.३०॥


कूर्मनाड्यां स्थैर्यम् ॥ ३.३१॥


मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम् ॥ ३.३२॥


प्रातिभाद्वा सर्वम् ॥ ३.३३॥


हृदये चित्तसंवित् ॥ ३.३४॥


सत्त्वपुरुषयोरत्यन्तासंकीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो भोगः परार्थत्वात्स्वार्थसंयमात्पुरुषज्ञानम् ॥ ३.३५॥


ततः प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्वादवार्ता जायन्ते ॥ ३.३६॥


ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः ॥ ३.३७॥


बन्धकारणशैथिल्यात्प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य परशरीरावेशः ॥ ३.३८॥


उदानजयाज्जलपङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग उत्क्रान्तिश्च ॥ ३.३९॥


समानजयाज्ज्वलनम् ॥ ३.४०॥


श्रोत्राकाशयोः सम्बन्धसंयमाद्दिव्यं श्रोत्रम् ॥ ३.४१॥


कायाकाशयोः सम्बन्धसंयमाल्लघुतूल-समापत्तेश्चाकाशगमनम् ॥ ३.४२॥


बहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयः ॥ ३.४३॥


स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद्भूतजयः ॥ ३.४४॥


ततोऽणिमादिप्रादुर्भावः कायसम्पत्तद्धर्मानभिघातश्च ॥ ३.४५॥


रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि कायसम्पत् ॥ ३.४६॥


ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्वसंयमादिन्द्रियजयः ॥ ३.४७॥


ततो मनोजवित्वं विकरणभावः प्रधानजयश्च ॥ ३.४८॥


सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च ॥ ३.४९॥


तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम् ॥ ३.५०॥


स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात् ॥ ३.५१॥


क्षणतत्क्रमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम् ॥ ३.५२॥


जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात् तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः ॥ ३.५३॥


तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयम् अक्रमं चेति विवेकजं ज्ञानम् ॥ ३.५४॥


सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यमिति ॥ ३.५५॥


॥ इति पतञ्जलि-विरचिते योग-सूत्रे तृतीयो विभूति-पादः ॥



॥ चतुर्थोऽध्यायः ॥ 

॥ कैवल्य-पादः ॥


जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजाः सिद्धयः ॥ ४.१॥


जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात् ॥ ४.२॥


निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत् ॥ ४.३॥


निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात् ॥ ४.४॥


प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम् ॥ ४.५॥


तत्र ध्यानजमनाशयम् ॥ ४.६॥


कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम् ॥ ४.७॥


ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्तिर्वासनानाम् ॥ ४.८॥


जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात् ॥ ४.९॥


तासामनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात् ॥ ४.१०॥


हेतुफलाश्रयालम्बनैः संगृहीतत्वादेषामभावे तदभावः ॥ ४.११॥


अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वभेदाद्धर्माणाम् ॥ ४.१२॥


ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः ॥ ४.१३॥


परिणामैकत्वाद्वस्तुतत्त्वम् ॥ ४.१४॥


वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोर्विभक्तः पन्थाः ॥ ४.१५॥


न चैकचित्ततन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं तदा किं स्यात् ॥ ४.१६॥


तदुपरागापेक्षित्वाच्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम् ॥ ४.१७॥


सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तत्प्रभोः पुरुषस्यापरिणामित्वात् ॥ ४.१८॥


न तत्स्वाभासं दृश्यत्वात् ॥ ४.१९॥


एकसमये चोभयानवधारणम् ॥ ४.२०॥


चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्गः स्मृतिसङ्करश्च ॥ ४.२१॥


चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम् ॥ ४.२२॥


द्रष्टृदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम् ॥ ४.२३॥


तदसंख्येयवासनाभिश्चित्रमपि परार्थं संहत्यकारित्वात् ॥ ४.२४॥


विशेषदर्शिन आत्मभावभावनाविनिवृत्तिः ॥ ४.२५॥


तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम् ॥ ४.२६॥


तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः ॥ ४.२७॥


हानमेषां क्लेशवदुक्तम् ॥ ४.२८॥


प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेर्धर्ममेघः समाधिः ॥ ४.२९॥


ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः ॥ ४.३०॥


तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेयमल्पम् ॥ ४.३१॥


ततः कृतार्थानां परिणामक्रमसमाप्तिर्गुणानाम् ॥ ४.३२॥


क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमः ॥ ४.३३॥


पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति ॥ ४.३४॥


॥ इति पतञ्जलि-विरचिते योग-सूत्रे चतुर्थः कैवल्य-पादः ॥


॥ इति श्री पातञ्जल-योग-सूत्राणि ॥


आप के समक्ष पातञ्जल योगसूत्र का हिंदी व्याख्यान जल्द ही प्रस्तुत होगा 

धन्यवाद 

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