प्रश्न
आकाशाद्वितता या स्यात सूक्ष्मा परमाणुतः।
सा किंरूपा स्थिता कुत्र वदैतन्नृपपुत्रक।।
अर्थ -:राजकुमार !बतलाओ ,जो वस्तु आकाश से भी अधिक विस्तृत और परमाणु से भी अधिक सूक्ष्म है ,उसका क्या स्वरूप हैं और वह कहाँ हैं ?
वितता चितिराकाशात सूक्ष्मा च प्रमाणुतः।
स्फुरद्रुपा स्वात्मसंस्था शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस ः।।
अर्थ -: ब्रह्मराक्षस !सुन ,चिति आकाश से भी विस्तृत और परमाणु से भी अधिक सूक्ष्म हैं।वह स्फुरणरूपा है और अपने आत्मा में ही स्थित है।
एकापि साSतीवितता कथं सूक्ष्मतरा भवेत्।
स्फुरत्त्वं किं किमात्मा च वदैतन्नृपनन्दनम।।
अर्थ -:राजपुत्र !वह एक होने पर भी अत्यन्त विस्तृत और अत्यन्त सूक्ष्म कैसे हो सकती है? स्फुरण क्या है और आत्मा क्या है-यह बताओ ?
कारणत्वाद्धि वितता सूक्ष्मा ग्राह्यत्वतोSपि च।
स्फुरत्वमात्मा च चिति ः शृणु त्वं ब्रह्मराक्षस।।
अर्थ -:ब्रह्मराक्षस !सुन ,सबका कारण होने के कारण वह विस्तृत है और इद्रिय आदि से ग्राहा न होने के कारण सूक्ष्म है। तथा स्फुरण और आत्मा चिति को ही कहते है।
स्थानं तदुपलब्धौ किं कथं वा सोपलभ्यते।
उपलब्ध्या च किं वा स्याद्वदैतन्नृपनंदन।।
अर्थ -:राजकुमार !बताओ ,उसकी उपलब्धिका स्थान क्या है ?किस प्रकार उसकी उपलब्धि होती है ?और उसे उपलब्ध कर लेने से क्या होता है?
क्रमशः

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