रविवार, 23 अगस्त 2020

अष्टावक्र गीता प्रकरण 4 ,5 और 6 ASTHAVAKR GEETA PRKARAN 4,5,6,

अष्टावक्र गीता 



चतुर्थ प्रकरण 

अष्टावक्र उवाच -


हन्तात्म ज्ञस्य धीरस्य खेलतो भोगलीलया।

न हि संसारवाहीकै-र्मूढैः सह समानता॥४- १॥


अष्टावक्र कहते हैं - स्वयं को जानने वाला बुद्धिमान व्यक्ति इस संसार की परिस्थितियों को खेल की तरह लेता है,  उसकी सांसारिक परिस्थितियों का बोझ (दबाव)  लेने वाले मोहित व्यक्ति के साथ बिलकुल भी समानता नहीं है ॥१॥


यत् पदं प्रेप्सवो दीनाः शक्राद्याः सर्वदेवताः।

अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति॥४- २॥


जिस पद की इन्द्र आदि सभी देवता इच्छा रखते हैं, उस पद में स्थित होकर भी योगी हर्ष नहीं करता है ॥२॥ 


तज्ज्ञस्य पुण्यपापाभ्यां स्पर्शो ह्यन्तर्न जायते।

न ह्याकाशस्य धूमेन दृश्यमानापि सङ्गतिः॥४- ३॥


उस (ब्रह्म) को जानने वाले के अन्तःकरण से पुण्य और पाप का स्पर्श नहीं होता है जिस प्रकार आकाश में दिखने वाले धुएँ से आकाश का संयोग नहीं होता है ॥३॥


आत्मैवेदं जगत्सर्वं ज्ञातं येन महात्मना।

यदृच्छया वर्तमानं तं निषेद्धुं क्षमेत कः॥४- ४॥


जिस महापुरुष ने स्वयं को ही इस समस्त जगत के रूप में जान लिया है, उसके स्वेच्छा से वर्तमान में रहने को रोकने की सामर्थ्य किसमें है ॥४॥


आब्रह्मस्तंबपर्यन्ते भूतग्रामे चतुर्विधे।

विज्ञस्यैव हि सामर्थ्य- मिच्छानिच्छाविवर्जने॥४- ५॥


ब्रह्मा से तृण तक, चारों प्रकार के प्राणियों में केवल आत्मज्ञानी ही इच्छा और अनिच्छा का परित्याग करने में समर्थ है ॥५॥


आत्मानमद्वयं कश्चिज्-जानाति जगदीश्वरं।

यद् वेत्ति तत्स कुरुते न भयं तस्य कुत्रचित्॥४- ६॥


आत्मा को एक और जगत का ईश्वर कोई कोई ही जानता है, जो ऐसा जान जाता है उसको किसी से भी किसी प्रकार का भय नहीं है ॥६॥


पंचम प्रकरण


अष्टावक्र उवाच -


न ते संगोऽस्ति केनापि किं शुद्धस्त्यक्तुमिच्छसि।

संघातविलयं कुर्वन्- नेवमेव लयं व्रज॥५- १॥


अष्टावक्र कहते हैं - तुम्हारा किसी से भी संयोग नहीं है, तुम शुद्ध हो, तुम क्या त्यागना चाहते हो, इस (अवास्तविक) सम्मिलन को समाप्त कर के ब्रह्म से योग (एकरूपता) को प्राप्त करो ॥१॥


उदेति भवतो विश्वं वारिधेरिव बुद्बुदः।

इति ज्ञात्वैकमात्मानं एवमेव लयं व्रज॥५- २॥


जिस प्रकार समुद्र से बुलबुले उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार विश्व एक आत्मा से ही उत्पन्न होता है। यह जानकर ब्रह्म से योग (एकरूपता) को प्राप्त करो॥२॥


प्रत्यक्षमप्यवस्तुत्वाद् विश्वं नास्त्यमले त्वयि।

रज्जुसर्प इव व्यक्तं एवमेव लयं व्रज॥५- ३॥


यद्यपि यह विश्व आँखों से दिखाई देता है परन्तु अवास्तविक है। विशुद्ध तुम में इस विश्व का अस्तित्व उसी प्रकार नहीं है जिस प्रकार कल्पित सर्प का रस्सी में। यह जानकर ब्रह्म से योग (एकरूपता) को प्राप्त करो ॥३॥

समदुःखसुखः पूर्ण आशानैराश्ययोः समः।

समजीवितमृत्युः सन्-नेवमेव लयं व्रज॥५- ४॥


स्वयं को सुख और दुःख में समान, पूर्ण, आशा और निराशा में समान, जीवन और मृत्यु में समान, सत्य जानकर ब्रह्म से योग (एकरूपता) को प्राप्त करो ॥४॥



षष्ठम प्रकरण 


अष्टावक्र उवाच -


आकाशवदनन्तोऽहं घटवत् प्राकृतं जगत्।

इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः॥६- १॥


अष्टावक्र कहते हैं - आकाश के समान मैं अनंत हूँ और यह जगत घड़े के समान महत्त्वहीन है, यह ज्ञान है । इसका न त्याग करना है और न ग्रहण, बस इसके साथ एकरूप होना है ॥१॥


महोदधिरिवाहं स प्रपंचो वीचिसऽन्निभः।

इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः॥६- २॥


मैं महासागर के समान हूँ और यह दृश्यमान संसार लहरों के समान । यह ज्ञान है, इसका न त्याग करना है और न ग्रहण बस इसके साथ एकरूप होना है ॥२॥


अहं स शुक्तिसङ्काशो रूप्यवद् विश्वकल्पना।

इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः॥६- ३॥


यह विश्व मुझमें वैसे ही कल्पित है जैसे कि सीप में चाँदी। यह ज्ञान है, इसका न त्याग करना है और न ग्रहण बस इसके साथ एक रूप होना है॥३॥


अहं वा सर्वभूतेषु सर्वभूतान्यथो मयि।

इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः॥६- ४॥


मैं समस्त प्राणियों में हूँ जैसे सभी प्राणी मुझमें हैं। यह ज्ञान है, इसका न त्याग करना है और न ग्रहण बस इसके साथ एकरूप होना है॥४॥



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