मंगलवार, 25 अगस्त 2020

अष्टावक्र गीता प्रकरण १०,११ व् १२,१३ ASHTAVAKR GEETA PRAKARAN 10,11,AND 12,13

अष्टावक्र गीता 


दशम प्रकरण


अष्टावक्र उवाच -


विहाय वैरिणं काममर्थं चानर्थसंकुलं।

धर्ममप्येतयोर्हेतुं सर्वत्रा ना दरं कुरु॥१०- १॥


श्री अष्टावक्र कहते हैं -  कामना और अनर्थों के समूह धन रूपी शत्रुओं को त्याग दो , इन दोनों के त्याग रूपी धर्म से युक्त होकर सर्वत्र विरक्त (उदासीन) हो जाओ॥१॥


स्वप्नेन्द्रजालवत् पश्य दिनानि त्रीणि पंच वा।

मित्रक्षेत्रधनागार- दारदायादिसंपदः॥१०- २॥


मित्र, जमीन, कोषागार, पत्नी और अन्य संपत्तियों को स्वप्न की माया के समान तीन या पाँच दिनों में नष्ट होने वाला देखो॥२॥


यत्र यत्र भवेत्तृष्णा संसारं विद्धि तत्र वै।

प्रौढवैराग्यमाश्रित्य वीततृष्णः सुखी भव॥१०- ३॥


जहाँ जहाँ आसक्ति हो उसको ही संसार जानो, इस प्रकार परिपक्व वैराग्य के आश्रय में तृष्णारहित होकर सुखी हो जाओ॥३॥


तृष्णामात्रात्मको बन्धस्-तन्नाशो मोक्ष उच्यते।

भवासंसक्तिमात्रेण प्राप्तितुष्टिर्मुहुर्मुहुः॥१०- ४॥


तृष्णा (कामना) मात्र ही स्वयं का बंधन है, उसके नाश को  मोक्ष कहा जाता है । संसार में अनासक्ति से ही निरंतर आनंद की प्राप्ति होती है ॥४॥


त्वमेकश्चेतनः शुद्धो जडं विश्वमसत्तथा।

अविद्यापि न किंचित्सा का बुभुत्सा तथापि ते॥१०- ५॥


तुम एक(अद्वितीय), चेतन और शुद्ध हो तथा यह विश्व अचेतन और असत्य है । तुममें अज्ञान का लेश मात्र भी नहीं है और जानने की इच्छा भी नहीं है ॥५॥


राज्यं सुताः कलत्राणि शरीराणि सुखानि च।

संसक्तस्यापि नष्टानि तव जन्मनि जन्मनि॥१०- ६॥


पूर्व जन्मों में बहुत बार तुम्हारे राज्य, पुत्र, स्त्री, शरीर और सुखों का, तुम्हारी आसक्ति होने पर भी नाश हो चुका है ॥६॥ 


अलमर्थेन कामेन सुकृतेनापि कर्मणा।

एभ्यः संसारकान्तारे न विश्रान्तमभून् मनः॥१०- ७॥


पर्याप्त धन, इच्छाओं और शुभ कर्मों द्वारा भी इस संसार रूपी माया से मन को शांति नहीं मिली ॥ ७ ॥


कृतं न कति जन्मानि कायेन मनसा गिरा।

दुःखमायासदं कर्म तदद्याप्युपरम्यताम्॥१०- ८॥


कितने जन्मों में शरीर, मन और वाणी से दुःख के कारण कर्मों को तुमने नहीं किया? अब उनसे उपरत (विरक्त) हो जाओ ॥ ८ ॥


एकादश प्रकरण 


अष्टावक्र उवाच -


भावाभावविकारश्च स्वभावादिति निश्चयी।

निर्विकारो गतक्लेशः सुखेनैवोपशाम्यति॥११- १॥


श्री अष्टावक्र कहते हैं - भाव(सृष्टि, स्थिति) और अभाव(प्रलय, मृत्यु) रूपी विकार स्वाभाविक हैं, ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला विकाररहित, दुखरहित होकर सुख पूर्वक शांति को प्राप्त हो जाता है ॥१॥


ईश्वरः सर्वनिर्माता नेहान्य इति निश्चयी।

अन्तर्गलितसर्वाशः शान्तः क्वापि न सज्जते॥११- २॥


ईश्वर सबका सृष्टा है कोई अन्य नहीं ऐसा निश्चित रूप से जानने वाले की सभी आन्तरिक इच्छाओं का नाश हो जाता है । वह शांत पुरुष सर्वत्र आसक्ति रहित हो जाता है ॥२॥


आपदः संपदः काले दैवादेवेति निश्चयी।

तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वान्छति न शोचति॥११- ३॥


संपत्ति (सुख) और विपत्ति (दुःख) का समय प्रारब्धवश (पूर्व कृत कर्मों के अनुसार) है, ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला संतोष और निरंतर संयमित इन्द्रियों से युक्त हो जाता है । वह न इच्छा करता है और न शोक ॥३॥


सुखदुःखे जन्ममृत्यू दैवादेवेति निश्चयी।

साध्यादर्शी निरायासः कुर्वन्नपि न लिप्यते॥११- ४॥


सुख-दुःख और जन्म-मृत्यु प्रारब्धवश (पूर्व कृत कर्मों के अनुसार) हैं, ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला, फल की इच्छा न रखने वाला, सरलता से कर्म करते हुए भी उनसे लिप्त नहीं होता है॥४॥ 


चिन्तया जायते दुःखं नान्यथेहेति निश्चयी।

तया हीनः सुखी शान्तः सर्वत्र गलितस्पृहः॥११- ५॥


चिंता से ही दुःख उत्पन्न होते हैं किसी अन्य कारण से नहीं, ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला, चिंता से रहित होकर सुखी, शांत और सभी इच्छाओं से मुक्त हो जाता है ॥५॥ 


नाहं देहो न मे देहो बोधोऽहमिति निश्चयी।

कैवल्यं इव संप्राप्तो न स्मरत्यकृतं कृतम्॥११- ६॥


न मैं यह शरीर हूँ और न यह शरीर मेरा है, मैं ज्ञानस्वरुप हूँ, ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला जीवन मुक्ति को प्राप्त करता है । वह किये हुए (भूतकाल) और न किये हुए (भविष्य के) कर्मों का स्मरण नहीं करता है ॥६॥


आब्रह्मस्तंबपर्यन्तं अहमेवेति निश्चयी।

निर्विकल्पः शुचिः शान्तः प्राप्ताप्राप्तविनिर्वृतः॥११- ७॥


तृण से लेकर ब्रह्मा तक सब कुछ मैं ही हूँ, ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला विकल्प (कामना) रहित, पवित्र, शांत और प्राप्त-अप्राप्त से आसक्ति रहित हो जाता है ॥७॥


नाश्चर्यमिदं विश्वं न किंचिदिति निश्चयी।

निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किंचिदिव शाम्यति॥११- ८॥


अनेक आश्चर्यों से युक्त यह विश्व अस्तित्वहीन है, ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला, इच्छा रहित और शुद्ध अस्तित्व हो जाता है । वह अपार शांति को प्राप्त करता है ॥८॥


द्वादश प्रकरण 


जनक उवाच -


कायकृत्यासहः पूर्वं ततो वाग्विस्तरासहः।

अथ चिन्तासहस्तस्माद् एवमेवाहमास्थितः॥१२- १॥


श्री जनक कहते हैं - पहले मैं शारीरिक कर्मों से निरपेक्ष (उदासीन) हुआ, फिर वाणी से निरपेक्ष (उदासीन) हुआ । अब चिंता से निरपेक्ष (उदासीन) होकर अपने स्वरुप में स्थित हूँ ॥१॥


प्रीत्यभावेन शब्दादेर- दृश्यत्वेन चात्मनः।

विक्षेपैकाग्रहृदय एवमेवाहमास्थितः॥१२- २॥



शब्द आदि विषयों में आसक्ति रहित होकर और आत्मा के दृष्टि का विषय न होने के कारण मैं निश्चल और एकाग्र ह्रदय से अपने स्वरुप में स्थित हूँ ॥२॥


समाध्यासादिविक्षिप्तौ व्यवहारः समाधये।

एवं विलोक्य नियमं एवमेवाहमास्थितः॥१२- ३॥


अध्यास (असत्य ज्ञान) आदि असामान्य स्थितियों और समाधि को एक नियम के समान देखते हुए मैं अपने स्वरुप में स्थित हूँ ॥३॥



हेयोपादेयविरहाद् एवं हर्षविषादयोः।

अभावादद्य हे ब्रह्मन्न् एवमेवाहमास्थितः॥१२- ४॥


हे ब्रह्म को जानने वाले! त्याज्य (छोड़ने योग्य) और संग्रहणीय से दूर होकर और सुख-दुःख के अभाव में मैं अपने स्वरुप में स्थित हूँ ॥४॥



आश्रमानाश्रमं ध्यानं चित्तस्वीकृतवर्जनं।

विकल्पं मम वीक्ष्यै-तैरेवमेवाहमास्थितः॥१२- ५॥


आश्रम - अनाश्रम, ध्यान और मन द्वारा स्वीकृत और निषिद्ध नियमों को देख कर मैं अपने स्वरुप में स्थित हूँ ॥५॥

 

कर्मानुष्ठानमज्ञानाद यथैवोपरमस्तथा।

बुध्वा सम्यगिदं तत्त्वं एवमेवाहमास्थितः॥१२- ६॥



कर्मों के अनुष्ठान रूपी अज्ञान से निवृत्त होकर और तत्त्व को सम्यक रूप से जान कर मैं अपने स्वरुप में स्थित हूँ ॥६॥



अचिंत्यं चिंत्यमानोऽपि चिन्तारूपं भजत्यसौ।

त्यक्त्वा तद्भावनं तस्माद् एवमेवाहमास्थितः॥१२- ७॥


अचिन्त्य के सम्बन्ध में विचार करते हुए भी विचार पर ही चिंतन किया जाता है। अतः उस विचार का भी परित्याग करके मैं अपने स्वरुप में स्थित हूँ॥७॥



एवमेव कृतं येन स कृतार्थो भवेदसौ।

एवमेव स्वभावो यः स कृतार्थो भवेदसौ॥१२- ८॥


जो इस प्रकार से आचरण करता है वह कृतार्थ (मुक्त) हो जाता है; जिसका इस प्रकार का स्वभाव है वह कृतार्थ (मुक्त) हो जाता है ॥८॥


त्रयोदश प्रकरण 



जनक उवाच-


अकिंचनभवं स्वास्थ्यं कौपीनत्वेऽपि दुर्लभं।

त्यागादाने विहायास्माद-हमासे यथासुखम्॥१३- १॥


श्री जनक कहते हैं - अकिंचन(कुछ अपना न) होने की सहजता केवल कौपीन पहनने पर भी मुश्किल से प्राप्त होती है, अतः त्याग और संग्रह की प्रवृत्ति यों को छोड़कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ ॥१॥



कुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खेद्यते।

मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम्॥१३- २॥


शारीरिक दुःख भी कहाँ(अर्थात नहीं) हैं, वाणी के दुःख भी कहाँ हैं, वहाँ मन भी कहाँ है, सभी प्रयत्नों को त्याग कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ ॥२॥


कृतं किमपि नैव स्याद् इति संचिन्त्य तत्त्वतः।

यदा यत्कर्तुमायाति तत् कृत्वासे यथासुखम्॥१३- ३॥


किये हुए किसी भी कार्य का वस्तुतः कोई अस्तित्व नहीं है, ऐसा तत्त्वपूर्वक विचार करके जब जो भी कर्त्तव्य है उसको करते हुए सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ ॥३॥


कर्मनैष्कर्म्यनिर्बन्ध-भावा देहस्थयोगिनः।

संयोगायोगविरहादह-मासे यथासुखम्॥१३- ४॥


शरीर भाव में स्थित योगियों के लिए कर्म और अकर्म रूपी बंधनकारी भाव होते हैं, पर संयोग और वियोग की प्रवृत्ति यों को छोड़कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ ॥४॥


अर्थानर्थौ न मे स्थित्या गत्या न शयनेन वा।

तिष्ठन् गच्छन् स्वपन् तस्मादहमासे यथासुखम्॥१३- ५॥


विश्राम, गति, शयन, बैठने, चलने और स्वप्न में वस्तुतः मेरे लाभ और हानि नहीं हैं, अतः सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ ॥५॥


स्वपतो नास्ति मे हानिः सिद्धिर्यत्नवतो न वा।

नाशोल्लासौ विहायास्-मदहमासे यथासुखम्॥१३- ६॥


सोने में मेरी हानि नहीं है और उद्योग अथवा अनुद्योग में मेरा लाभ नहीं है अतः हर्ष और शोक की प्रवृत्तियों को छोड़कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ ॥६॥


सुखादिरूपा नियमं भावेष्वालोक्य भूरिशः।

शुभाशुभे विहायास्मादह-मासे यथासुखम्॥१३- ७॥


सुख, दुःख आदि स्थितियों के क्रम से आने के नियम पर बार बार विचार करके, शुभ(अच्छे) और अशुभ(बुरे) की  प्रवृत्तियों को छोड़कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ ॥७॥


धन्यवाद 

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