रविवार, 23 अगस्त 2020

अष्टावक्र गीता प्रकरण ७,८ ,९ ASHTAVAKR GEETA PRAKARAN 7,8,AND 9

अष्टावक्र गीता 





सप्तम प्रकरण

जनक उवाच -


मय्यनंतमहांभोधौ विश्वपोत इतस्ततः।

भ्रमति स्वांतवातेन न ममास्त्यसहिष्णुता॥७- १॥


राजा जनक कहते हैं - मुझ अनंत महासागर में विश्व रूपी जहाज अपनी अन्तः वायु से इधर - उधर घूमता है पर इससे मुझमें विक्षोभ नहीं होता है ॥१॥


मय्यनंतमहांभोधौ जगद्वीचिः स्वभावतः।

उदेतु वास्तमायातु न मे वृद्धिर्न च क्षतिः॥७- २॥


मुझ अनंत महासागर में विश्व रूपी लहरें माया से स्वयं ही उदित और अस्त होती रहती हैं, इससे मुझमें वृद्धि या क्षति नहीं होती है ॥२॥


मय्यनंतमहांभोधौ विश्वं नाम विकल्पना।

अतिशांतो निराकार एतदेवाहमास्थितः॥७- ३॥


मुझ अनंत महासागर में विश्व एक अवास्तविकता (स्वप्न) है, मैं अति शांत और निराकार रूप से स्थित हूँ ॥३॥


नात्मा भावेषु नो भावस्-तत्रानन्ते निरंजने।

इत्यसक्तोऽस्पृहः शान्त एतदेवाहमा स्थितः ॥७- ४॥


उस अनंत और निरंजन अवस्था में न 'मैं' का भाव है और न कोई अन्य भाव ही, इस प्रकार असक्त, बिना किसी इच्छा के और शांत रूप से मैं स्थित हूँ ॥४॥


अहो चिन्मात्रमेवाहं इन्द्रजालोपमं जगत्।

अतो मम कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना॥७- ५॥


आश्चर्य मैं शुद्ध चैतन्य हूँ और यह जगत असत्य जादू के समान है, इस प्रकार मुझमें कहाँ और कैसे अच्छे (उपयोगी) और बुरे (अनुपयोगी) की कल्पना ॥५॥


श्रीललितोपनिषत SHRI LALITOPANISHAT KUNDALANI


॥ श्रीललितोपनिषत् ॥


अष्टावक्र गीता प्रकरण 4 ,5 और 6 ASTHAVAKR GEETA PRKARAN 4,5,6,

अष्टावक्र गीता 



चतुर्थ प्रकरण 

अष्टावक्र उवाच -


हन्तात्म ज्ञस्य धीरस्य खेलतो भोगलीलया।

न हि संसारवाहीकै-र्मूढैः सह समानता॥४- १॥


अष्टावक्र कहते हैं - स्वयं को जानने वाला बुद्धिमान व्यक्ति इस संसार की परिस्थितियों को खेल की तरह लेता है,  उसकी सांसारिक परिस्थितियों का बोझ (दबाव)  लेने वाले मोहित व्यक्ति के साथ बिलकुल भी समानता नहीं है ॥१॥


यत् पदं प्रेप्सवो दीनाः शक्राद्याः सर्वदेवताः।

अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति॥४- २॥


जिस पद की इन्द्र आदि सभी देवता इच्छा रखते हैं, उस पद में स्थित होकर भी योगी हर्ष नहीं करता है ॥२॥ 


तज्ज्ञस्य पुण्यपापाभ्यां स्पर्शो ह्यन्तर्न जायते।

न ह्याकाशस्य धूमेन दृश्यमानापि सङ्गतिः॥४- ३॥


उस (ब्रह्म) को जानने वाले के अन्तःकरण से पुण्य और पाप का स्पर्श नहीं होता है जिस प्रकार आकाश में दिखने वाले धुएँ से आकाश का संयोग नहीं होता है ॥३॥


आत्मैवेदं जगत्सर्वं ज्ञातं येन महात्मना।

यदृच्छया वर्तमानं तं निषेद्धुं क्षमेत कः॥४- ४॥


जिस महापुरुष ने स्वयं को ही इस समस्त जगत के रूप में जान लिया है, उसके स्वेच्छा से वर्तमान में रहने को रोकने की सामर्थ्य किसमें है ॥४॥


आब्रह्मस्तंबपर्यन्ते भूतग्रामे चतुर्विधे।

विज्ञस्यैव हि सामर्थ्य- मिच्छानिच्छाविवर्जने॥४- ५॥


ब्रह्मा से तृण तक, चारों प्रकार के प्राणियों में केवल आत्मज्ञानी ही इच्छा और अनिच्छा का परित्याग करने में समर्थ है ॥५॥


आत्मानमद्वयं कश्चिज्-जानाति जगदीश्वरं।

यद् वेत्ति तत्स कुरुते न भयं तस्य कुत्रचित्॥४- ६॥


आत्मा को एक और जगत का ईश्वर कोई कोई ही जानता है, जो ऐसा जान जाता है उसको किसी से भी किसी प्रकार का भय नहीं है ॥६॥

शनिवार, 22 अगस्त 2020

अष्टावक्र गीता तृतीय प्रकरण ASHTAVAKR GEETA TRITIY PRAKARAN


अष्टावक्र गीता 



अष्टावक्र उवाच -


अविनाशिनमात्मानं एकं विज्ञाय तत्त्वतः।

तवात्मज्ञानस्य धीरस्य कथमर्थार्जने रतिः॥३- १॥


स्वयं के अज्ञान से भ्रमवश विषयों से लगाव हो जाता है जैसे सीप में चाँदी का भ्रम होने पर उसमें लोभ उत्पन्न हो जाता है ॥२॥


आत्माज्ञानादहो प्रीतिर्विषयभ्रमगोचरे।

शुक्तेरज्ञानतो लोभो यथा रजतविभ्रमे॥३- २॥


स्वयं के अज्ञान से भ्रमवश विषयों से लगाव हो जाता है जैसे सीप में चाँदी का भ्रम होने पर उसमें लोभ उत्पन्न हो जाता है ॥२॥


विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरङ्गा इव सागरे।

सोऽहमस्मीति विज्ञाय किं दीन इव धावसि॥३- ३॥


सागर से लहरों के समान जिससे यह विश्व उत्पन्न होता है, वह मैं ही हूँ जानकर तुम एक दीन जैसे कैसे भाग सकते हो ॥३॥

श्रुत्वापि शुद्धचैतन्य आत्मानमतिसुन्दरं।

उपस्थेऽत्यन्तसंसक्तो मालिन्यमधिगच्छति॥३- ४॥


यह सुनकर भी कि आत्मा शुद्ध, चैतन्य और अत्यंत सुन्दर है तुम कैसे जननेंद्रिय में आसक्त होकर मलिनता को प्राप्त हो सकते हो ॥४॥

सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।

मुनेर्जानत आश्चर्यं ममत्वमनुवर्तते॥३- ५॥


सभी प्राणियों में स्वयं को और स्वयं में सब प्राणियों को जानने वाले मुनि में ममता की भावना का बने रहना आश्चर्य ही है ॥५॥


आस्थितः परमाद्वैतं मोक्षार्थेऽपि व्यवस्थितः।

आश्चर्यं कामवशगो विकलः केलिशिक्षया॥३- ६॥


एक ब्रह्म का आश्रय लेने वाले और मोक्ष के अर्थ का ज्ञान रखने वाले का आमोद-प्रमोद द्वारा उत्पन्न कामनाओं से विचलित होना आश्चर्य ही है॥६॥


उद्भूतं ज्ञानदुर्मित्रम-वधार्यातिदुर्बलः।

आश्चर्यं काममाकाङ्क्षेत् कालमन्तमनुश्रितः॥३- ७॥


अंत समय के निकट पहुँच चुके व्यक्ति का उत्पन्न ज्ञान के अमित्र काम की इच्छा रखना, जिसको धारण करने में वह अत्यंत अशक्त है, आश्चर्य ही है ॥७॥


इहामुत्र विरक्तस्य नित्यानित्यविवेकिनः।

आश्चर्यं मोक्षकामस्य मोक्षाद् एव विभीषिका॥३- ८॥


इस लोक और परलोक से विरक्त, नित्य और अनित्य का ज्ञान रखने वाले और मोक्ष की कामना रखने वालों का मोक्ष से डरना, आश्चर्य ही है ॥८॥


धीरस्तु भोज्यमानोऽपि पीड्यमानोऽपि सर्वदा।

आत्मानं केवलं पश्यन् न तुष्यति न कुप्यति॥३- ९॥


सदा केवल आत्मा का दर्शन करने वाले बुद्धिमान व्यक्ति भोजन कराने पर या पीड़ित करने पर न प्रसन्न होते हैं और न क्रोध ही करते हैं ॥९॥


चेष्टमानं शरीरं स्वं पश्यत्यन्यशरीरवत्।

संस्तवे चापि निन्दायां कथं क्षुभ्येत् महाशयः॥३- १०॥


अपने कार्यशील शरीर को दूसरों के शरीरों की तरह देखने वाले महापुरुषों को प्रशंसा या निंदा कैसे विचलित कर सकती है ॥१०॥


मायामात्रमिदं विश्वं पश्यन् विगतकौतुकः।

अपि सन्निहिते मृत्यौ कथं त्रस्यति धीरधीः॥३- ११॥


समस्त जिज्ञासाओं से रहित, इस विश्व को माया में कल्पित देखने वाले, स्थिर प्रज्ञा वाले व्यक्ति को आसन्न मृत्यु भी कैसे भयभीत कर सकती है ॥११॥


निःस्पृहं मानसं यस्य नैराश्येऽपि महात्मनः।

तस्यात्मज्ञानतृप्तस्य तुलना केन जायते॥३- १२॥


निराशा में भी समस्त इच्छाओं से रहित, स्वयं के ज्ञान से प्रसन्न महात्मा की तुलना किससे की जा सकती है ॥१२॥


स्वभावाद् एव जानानो दृश्यमेतन्न किंचन।

इदं ग्राह्यमिदं त्याज्यं स किं पश्यति धीरधीः॥३- १३॥


स्वभाव से ही विश्व को दृश्यमान जानो, इसका कुछ भी अस्तित्व नहीं है । यह ग्रहण करने योग्य है और यह त्यागने योग्य, देखने वाला स्थिर प्रज्ञायुक्त व्यक्ति क्या देखता है? ॥१३॥


अंतस्त्यक्तकषायस्य निर्द्वन्द्वस्य निराशिषः।

यदृच्छयागतो भोगो न दुःखाय न तुष्टये॥३- १४॥


विषयों की आतंरिक आसक्ति का त्याग करने वाले, संदेह से परे, बिना किसी इच्छा वाले व्यक्ति को  स्वतः आने वाले भोग न दुखी कर सकते है और न सुखी ॥१४॥



धन्यवाद 

शुक्रवार, 21 अगस्त 2020

अष्टावक्रगीता द्वितीय प्रकरण ASTAVAKR GEETA DVITIY PRAKARAN

अष्टावक्रगीता

 

द्वितीय प्रकरण 

जनक उवाच -


अहो निरंजनः शान्तोबोधो ऽ हं प्रकृतेः परः ।

एतावंतमहं कालंमोहेनैव विडम्बितः ॥ २-१ ॥


राजा जनक कहते हैं - आश्चर्य! मैं निष्कलंक, शांत, प्रकृति से परे, ज्ञान  स्वरुप हूँ, इतने समय तक मैं मोह से संतप्त किया गया ॥१॥


यथा प्रकाश याम्येको देहमेनो तथा जगत् ।

अतो मम जगत्सर्वम थवा न च किंचन॥ २-२॥


जिस प्रकार मैं इस शरीर को प्रकाशित करता हूँ, उसी प्रकार इस विश्व को भी । अतः मैं यह समस्त विश्व ही हूँ अथवा कुछ भी नहीं ॥२॥


सशरीरमहो विश्वं परित्यज्य मया ऽ धुना ।

कुतश्चित् कौशलादेव परमात्मा विलोक्यते ॥२-३॥


अब शरीर सहित इस विश्व को त्याग कर किसी कौशल द्वारा ही मेरे द्वारा परमात्मा का दर्शन किया जाता है ॥३॥


यथा न तोयतो भिन्नास्-तरंगाः फेन बुदबुदाः ।

आत्मनो न तथा भिन्नं विश्वमात्मविनिर्गतम् ॥२-४॥


जिस प्रकार पानी लहर, फेन और बुलबुलों से पृथक नहीं है उसी प्रकार आत्मा भी स्वयं से निकले इस विश्व से अलग नहीं है ॥४॥


तंतुमात्रो भवेदेवपटो यद्वद्विचारितः ।

आत्म तन्मात्रमेवेदंतद्वद्विश्वं विचारितम् ॥२-५॥


जिस प्रकार विचार करने पर वस्त्र तंतु (धागा) मात्र ही ज्ञात होता है, उसी प्रकार यह समस्त विश्व आत्मा मात्र ही है ॥५॥


यथैवेक्षुरसे क्लृप्ता तेन व्याप्तैव शर्करा ।

तथा विश्वं मयि क्लृप्तंमया व्याप्तं निरन्तरम् ॥२-६॥


जिस प्रकार गन्ने के रस से बनी शक्कर उससे ही व्याप्त होती है, उसी प्रकार यह विश्व मुझसे ही बना है और निरंतर मुझसे ही व्याप्त है ॥६॥


आत्माऽज्ञानाज्जगद्भाति आत्मज्ञानान्न भासते।

रज्जवज्ञानादहिर्भातितज्ज्ञानाद्भासते न हि॥ २-७॥


आत्मा अज्ञानवश ही विश्व के रूप में दिखाई देती है, आत्म-ज्ञान होने पर यह विश्व दिखाई नहीं देता है । रस्सी अज्ञानवश सर्प जैसी दिखाई देती है, रस्सी का ज्ञान हो जाने पर सर्प दिखाई नहीं देता है ॥७॥


प्रकाशो मे निजं रूपं नातिरिक्तोऽस्म्यहं ततः।

यदा प्रकाशते विश्वंतदाऽहंभास एव हि॥ २-८॥


प्रकाश मेरा स्वरुप है, इसके अतिरिक्त मैं कुछ और नहीं हूँ । वह प्रकाश जैसे इस विश्व को प्रकाशित  करता है वैसे ही इस "मैं" भाव को भी ॥८॥


अहो विकल्पितं विश्वंज्ञानान्मयि भासते।

रूप्यं शुक्तौ फणी रज्जौ वारि सूर्यकरे यथा॥ २-९॥


आश्चर्य, यह कल्पित विश्व अज्ञान से मुझमें दिखाई देता है जैसे सीप में चाँदी , रस्सी में सर्प और सूर्य किरणों में पानी ॥९॥


मत्तो विनिर्गतं विश्वं मय्येव लयमेष्यति।

मृदि कुम्भो जले वीचिःकनके कटकं यथा॥ २-१०॥


मुझसे उत्पन्न हुआ विश्व मुझमें ही विलीन हो जाता है जैसे घड़ा मिटटी में, लहर जल में और कड़ा सोने में विलीन हो जाता है ॥१०॥


अहो अहं नमो मह्यं विनाशो यस्य नास्ति मे।

ब्रह्मादिस्तंबपर्यन्तंजगन्नाशोऽपि तिष्ठतः॥ २-११॥


आश्चर्य है, मुझको नमस्कार है, समस्त विश्व के नष्ट हो जाने पर भी जिसका विनाश नहीं होता, जो तृण से ब्रह्मा तक सबका विनाश होने पर भी विद्यमान रहता है ॥११॥


अहो अहं नमो मह्यं एकोऽहं देहवानपि।

क्वचिन्न गन्ता नागन्ता व्याप्य विश्वमवस्थितः॥ २-१२॥


आश्चर्य है, मुझको नमस्कार है, मैं एक हूँ, शरीर वाला होते हुए भी जो न कहीं जाता है और न कहीं आता है और समस्त विश्व को व्याप्त करके स्थित है ॥१२॥


अहो अहं नमो मह्यं दक्षो नास्तीह मत्समः।

असंस्पृश्य शरीरेण येन विश्वं चिरं धृतम्॥२-१३॥


आश्चर्य है, मुझको नमस्कार है, जो कुशल है और जिसके समान कोई और नहीं है, जिसने इस शरीर को बिना स्पर्श करते हुए इस विश्व को अनादि काल से धारण किया हुआ है ॥१३॥


अहो अहं नमो मह्यं यस्य मे नास्ति किंचन।

अथवा यस्य मे सर्वं यद्वाङ्मनसगोचरम्॥२-१४॥


आश्चर्य है, मुझको नमस्कार है, जिसका यह कुछ भी नहीं है अथवा जो भी वाणी और मन से समझ में आता है वह सब जिसका है ॥१४॥


ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञाता त्रितयं नास्ति वास्तवं।

अज्ञानाद् भाति यत्रेदं सोऽहमस्मि निरंजनः॥ २-१५॥


ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता यह तीनों वास्तव में नहीं हैं, यह जो अज्ञानवश दिखाई देता है वह निष्कलंक मैं ही हूँ ॥१५॥  

द्वैतमूलमहो दुःखं नान्य-त्तस्याऽस्ति भेषजं।

दृश्यमेतन् मृषा सर्वं एकोऽहं चिद्रसोमलः॥ २-१६॥


द्वैत (भेद)  सभी दुखों का मूल कारण है । इसकी इसके अतिरिक्त कोई और औषधि नहीं है कि यह सब जो दिखाई दे रहा है वह सब असत्य है । मैं एक, चैतन्य और निर्मल हूँ ॥१६॥


बोधमात्रोऽहमज्ञानाद् उपाधिः कल्पितो मया।

एवं विमृशतो नित्यं निर्विकल्पे स्थितिर्मम॥ २-१७॥


मैं केवल ज्ञान स्वरुप हूँ, अज्ञान से ही मेरे द्वारा स्वयं में अन्य गुण कल्पित किये गए हैं, ऐसा विचार करके मैं सनातन और कारणरहित रूप से स्थित हूँ ॥१७॥


न मे बन्धोऽस्ति मोक्षो वा भ्रान्तिः शान्तो निराश्रया।

अहो मयि स्थितं विश्वं वस्तुतो न मयि स्थितम्॥२-१८॥


न मुझे कोई बंधन है और न कोई मुक्ति का भ्रम । मैं शांत और आश्रयरहित हूँ । मुझमें स्थित यह विश्व भी वस्तुतः मुझमें स्थित नहीं है ॥१८॥

  

सशरीरमिदं विश्वं न किंचिदिति निश्चितं।

शुद्धचिन्मात्र आत्मा च तत्कस्मिन् कल्पनाधुना॥२-१९।


यह निश्चित है कि इस शरीर सहित यह विश्व अस्तित्वहीन है, केवल शुद्ध, चैतन्य आत्मा का ही अस्तित्व है । अब इसमें क्या कल्पना की जाये ॥१९॥


शरीरं स्वर्गनरकौ बन्धमोक्षौ भयं तथा।

कल्पनामात्रमेवैतत् किं मे कार्यं चिदात्मनः॥ २-२०॥


शरीर, स्वर्ग, नरक, बंधन, मोक्ष और भय ये सब कल्पना मात्र ही हैं, इनसे मुझ चैतन्य स्वरुप का क्या प्रयोजन है ॥२०॥


अहो जनसमूहेऽपि न द्वैतं पश्यतो मम।

अरण्यमिव संवृत्तं क्व रतिं करवाण्यहम्॥२-२१॥


आश्चर्य कि मैं लोगों के समूह में भी दूसरे को नहीं देखता हूँ, वह भी निर्जन ही प्रतीत होता है । अब मैं किससे मोह करूँ ॥२१॥


नाहं देहो न मे देहो जीवो नाहमहं हि चित्।

अयमेव हि मे बन्ध आसीद्या जीविते स्पृहा॥ २-२२॥


न मैं शरीर हूँ न यह शरीर ही मेरा है, न मैं जीव हूँ , मैं चैतन्य हूँ । मेरे अन्दर जीने की इच्छा ही मेरा बंधन थी ॥२२॥


अहो भुवनकल्लोलै-र्विचित्रैर्द्राक् समुत्थितं।

मय्यनंतमहांभोधौ चित्तवाते समुद्यते॥ २-२३॥


आश्चर्य, मुझ अनंत महासागर में चित्तवायु उठने पर ब्रह्माण्ड रूपी विचित्र तरंगें उपस्थित हो जाती हैं॥२३॥


मय्यनंतमहांभोधौ चित्तवाते प्रशाम्यति।

अभाग्याज्जीववणिजो जगत्पोतो विनश्वरः॥ २-२४॥


मुझ अनंत महासागर में चित्तवायु के शांत होने पर जीव रूपी वणिक का संसार रूपी जहाज जैसे दुर्भाग्य से नष्ट हो जाता है ॥२४॥


मय्यनन्तमहांभोधा-वाश्चर्यं जीववीचयः।

उद्यन्ति घ्नन्ति खेलन्ति प्रविशन्ति स्वभावतः॥२-२५॥


आश्चर्य, मुझ अनंत महासागर में जीव रूपी लहरें उत्पन्न होती हैं, मिलती हैं, खेलती हैं और स्वभाव से मुझमें प्रवेश कर जाती हैं ॥२५॥  


इति श्रीमदष्टावक्रमुनिविरचितायां द्वितीयं प्रकरणं समाप्तम् ॥२॥


धन्यवाद

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