शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2022

80 वॉ वार्षिक श्रृंगार

                     श्री मार्कण्डेय महादेव धाम 
भूतभावन भगवान शंकर की पुनीत पतितपावनी सांस्कृतिक नगरी काशी के उत्तर पूर्व त्रिकोण पर गंगा और गोमता के पवित्र संगम पर महान तपस्वी महर्षि मारकण्डेश्वर महादेव का 80वॉ वार्षिकोत्सव श्रृङ्गार कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी वार रविवार दिनांक 06/11/2022 ई. को होना निश्चित है। अतः धर्म प्राण सज्जनों को पुण्य अवसर पर उपस्थित होकर बाबा के दर्शन व श्रृंगार मे तन मन धन
द्वारा अधिक से अधिक सहयोग देकर यश के भागी बने ।

मंगलवार, 25 अगस्त 2020

Ashtavakra Geeta || अष्टावक्र गीता प्रकरण १६ व १७ ASHTAVAKR GEETA PRKARAN 16 AND 17

 

अष्टावक्र गीता 

अष्टावक्र गीता प्रकरण १४ व १५ ASHTAVAKR GEETA PRAKARAN 14 AND 15

 

अष्टावक्र गीता 


अष्टावक्र गीता प्रकरण १०,११ व् १२,१३ ASHTAVAKR GEETA PRAKARAN 10,11,AND 12,13

अष्टावक्र गीता 

रविवार, 23 अगस्त 2020

अष्टावक्र गीता प्रकरण ७,८ ,९ ASHTAVAKR GEETA PRAKARAN 7,8,AND 9

अष्टावक्र गीता 





सप्तम प्रकरण

जनक उवाच -


मय्यनंतमहांभोधौ विश्वपोत इतस्ततः।

भ्रमति स्वांतवातेन न ममास्त्यसहिष्णुता॥७- १॥


राजा जनक कहते हैं - मुझ अनंत महासागर में विश्व रूपी जहाज अपनी अन्तः वायु से इधर - उधर घूमता है पर इससे मुझमें विक्षोभ नहीं होता है ॥१॥


मय्यनंतमहांभोधौ जगद्वीचिः स्वभावतः।

उदेतु वास्तमायातु न मे वृद्धिर्न च क्षतिः॥७- २॥


मुझ अनंत महासागर में विश्व रूपी लहरें माया से स्वयं ही उदित और अस्त होती रहती हैं, इससे मुझमें वृद्धि या क्षति नहीं होती है ॥२॥


मय्यनंतमहांभोधौ विश्वं नाम विकल्पना।

अतिशांतो निराकार एतदेवाहमास्थितः॥७- ३॥


मुझ अनंत महासागर में विश्व एक अवास्तविकता (स्वप्न) है, मैं अति शांत और निराकार रूप से स्थित हूँ ॥३॥


नात्मा भावेषु नो भावस्-तत्रानन्ते निरंजने।

इत्यसक्तोऽस्पृहः शान्त एतदेवाहमा स्थितः ॥७- ४॥


उस अनंत और निरंजन अवस्था में न 'मैं' का भाव है और न कोई अन्य भाव ही, इस प्रकार असक्त, बिना किसी इच्छा के और शांत रूप से मैं स्थित हूँ ॥४॥


अहो चिन्मात्रमेवाहं इन्द्रजालोपमं जगत्।

अतो मम कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना॥७- ५॥


आश्चर्य मैं शुद्ध चैतन्य हूँ और यह जगत असत्य जादू के समान है, इस प्रकार मुझमें कहाँ और कैसे अच्छे (उपयोगी) और बुरे (अनुपयोगी) की कल्पना ॥५॥


श्रीललितोपनिषत SHRI LALITOPANISHAT KUNDALANI


॥ श्रीललितोपनिषत् ॥


अष्टावक्र गीता प्रकरण 4 ,5 और 6 ASTHAVAKR GEETA PRKARAN 4,5,6,

अष्टावक्र गीता 



चतुर्थ प्रकरण 

अष्टावक्र उवाच -


हन्तात्म ज्ञस्य धीरस्य खेलतो भोगलीलया।

न हि संसारवाहीकै-र्मूढैः सह समानता॥४- १॥


अष्टावक्र कहते हैं - स्वयं को जानने वाला बुद्धिमान व्यक्ति इस संसार की परिस्थितियों को खेल की तरह लेता है,  उसकी सांसारिक परिस्थितियों का बोझ (दबाव)  लेने वाले मोहित व्यक्ति के साथ बिलकुल भी समानता नहीं है ॥१॥


यत् पदं प्रेप्सवो दीनाः शक्राद्याः सर्वदेवताः।

अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति॥४- २॥


जिस पद की इन्द्र आदि सभी देवता इच्छा रखते हैं, उस पद में स्थित होकर भी योगी हर्ष नहीं करता है ॥२॥ 


तज्ज्ञस्य पुण्यपापाभ्यां स्पर्शो ह्यन्तर्न जायते।

न ह्याकाशस्य धूमेन दृश्यमानापि सङ्गतिः॥४- ३॥


उस (ब्रह्म) को जानने वाले के अन्तःकरण से पुण्य और पाप का स्पर्श नहीं होता है जिस प्रकार आकाश में दिखने वाले धुएँ से आकाश का संयोग नहीं होता है ॥३॥


आत्मैवेदं जगत्सर्वं ज्ञातं येन महात्मना।

यदृच्छया वर्तमानं तं निषेद्धुं क्षमेत कः॥४- ४॥


जिस महापुरुष ने स्वयं को ही इस समस्त जगत के रूप में जान लिया है, उसके स्वेच्छा से वर्तमान में रहने को रोकने की सामर्थ्य किसमें है ॥४॥


आब्रह्मस्तंबपर्यन्ते भूतग्रामे चतुर्विधे।

विज्ञस्यैव हि सामर्थ्य- मिच्छानिच्छाविवर्जने॥४- ५॥


ब्रह्मा से तृण तक, चारों प्रकार के प्राणियों में केवल आत्मज्ञानी ही इच्छा और अनिच्छा का परित्याग करने में समर्थ है ॥५॥


आत्मानमद्वयं कश्चिज्-जानाति जगदीश्वरं।

यद् वेत्ति तत्स कुरुते न भयं तस्य कुत्रचित्॥४- ६॥


आत्मा को एक और जगत का ईश्वर कोई कोई ही जानता है, जो ऐसा जान जाता है उसको किसी से भी किसी प्रकार का भय नहीं है ॥६॥

शनिवार, 22 अगस्त 2020

अष्टावक्र गीता तृतीय प्रकरण ASHTAVAKR GEETA TRITIY PRAKARAN


अष्टावक्र गीता 



अष्टावक्र उवाच -


अविनाशिनमात्मानं एकं विज्ञाय तत्त्वतः।

तवात्मज्ञानस्य धीरस्य कथमर्थार्जने रतिः॥३- १॥


स्वयं के अज्ञान से भ्रमवश विषयों से लगाव हो जाता है जैसे सीप में चाँदी का भ्रम होने पर उसमें लोभ उत्पन्न हो जाता है ॥२॥


आत्माज्ञानादहो प्रीतिर्विषयभ्रमगोचरे।

शुक्तेरज्ञानतो लोभो यथा रजतविभ्रमे॥३- २॥


स्वयं के अज्ञान से भ्रमवश विषयों से लगाव हो जाता है जैसे सीप में चाँदी का भ्रम होने पर उसमें लोभ उत्पन्न हो जाता है ॥२॥


विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरङ्गा इव सागरे।

सोऽहमस्मीति विज्ञाय किं दीन इव धावसि॥३- ३॥


सागर से लहरों के समान जिससे यह विश्व उत्पन्न होता है, वह मैं ही हूँ जानकर तुम एक दीन जैसे कैसे भाग सकते हो ॥३॥

श्रुत्वापि शुद्धचैतन्य आत्मानमतिसुन्दरं।

उपस्थेऽत्यन्तसंसक्तो मालिन्यमधिगच्छति॥३- ४॥


यह सुनकर भी कि आत्मा शुद्ध, चैतन्य और अत्यंत सुन्दर है तुम कैसे जननेंद्रिय में आसक्त होकर मलिनता को प्राप्त हो सकते हो ॥४॥

सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।

मुनेर्जानत आश्चर्यं ममत्वमनुवर्तते॥३- ५॥


सभी प्राणियों में स्वयं को और स्वयं में सब प्राणियों को जानने वाले मुनि में ममता की भावना का बने रहना आश्चर्य ही है ॥५॥


आस्थितः परमाद्वैतं मोक्षार्थेऽपि व्यवस्थितः।

आश्चर्यं कामवशगो विकलः केलिशिक्षया॥३- ६॥


एक ब्रह्म का आश्रय लेने वाले और मोक्ष के अर्थ का ज्ञान रखने वाले का आमोद-प्रमोद द्वारा उत्पन्न कामनाओं से विचलित होना आश्चर्य ही है॥६॥


उद्भूतं ज्ञानदुर्मित्रम-वधार्यातिदुर्बलः।

आश्चर्यं काममाकाङ्क्षेत् कालमन्तमनुश्रितः॥३- ७॥


अंत समय के निकट पहुँच चुके व्यक्ति का उत्पन्न ज्ञान के अमित्र काम की इच्छा रखना, जिसको धारण करने में वह अत्यंत अशक्त है, आश्चर्य ही है ॥७॥


इहामुत्र विरक्तस्य नित्यानित्यविवेकिनः।

आश्चर्यं मोक्षकामस्य मोक्षाद् एव विभीषिका॥३- ८॥


इस लोक और परलोक से विरक्त, नित्य और अनित्य का ज्ञान रखने वाले और मोक्ष की कामना रखने वालों का मोक्ष से डरना, आश्चर्य ही है ॥८॥


धीरस्तु भोज्यमानोऽपि पीड्यमानोऽपि सर्वदा।

आत्मानं केवलं पश्यन् न तुष्यति न कुप्यति॥३- ९॥


सदा केवल आत्मा का दर्शन करने वाले बुद्धिमान व्यक्ति भोजन कराने पर या पीड़ित करने पर न प्रसन्न होते हैं और न क्रोध ही करते हैं ॥९॥


चेष्टमानं शरीरं स्वं पश्यत्यन्यशरीरवत्।

संस्तवे चापि निन्दायां कथं क्षुभ्येत् महाशयः॥३- १०॥


अपने कार्यशील शरीर को दूसरों के शरीरों की तरह देखने वाले महापुरुषों को प्रशंसा या निंदा कैसे विचलित कर सकती है ॥१०॥


मायामात्रमिदं विश्वं पश्यन् विगतकौतुकः।

अपि सन्निहिते मृत्यौ कथं त्रस्यति धीरधीः॥३- ११॥


समस्त जिज्ञासाओं से रहित, इस विश्व को माया में कल्पित देखने वाले, स्थिर प्रज्ञा वाले व्यक्ति को आसन्न मृत्यु भी कैसे भयभीत कर सकती है ॥११॥


निःस्पृहं मानसं यस्य नैराश्येऽपि महात्मनः।

तस्यात्मज्ञानतृप्तस्य तुलना केन जायते॥३- १२॥


निराशा में भी समस्त इच्छाओं से रहित, स्वयं के ज्ञान से प्रसन्न महात्मा की तुलना किससे की जा सकती है ॥१२॥


स्वभावाद् एव जानानो दृश्यमेतन्न किंचन।

इदं ग्राह्यमिदं त्याज्यं स किं पश्यति धीरधीः॥३- १३॥


स्वभाव से ही विश्व को दृश्यमान जानो, इसका कुछ भी अस्तित्व नहीं है । यह ग्रहण करने योग्य है और यह त्यागने योग्य, देखने वाला स्थिर प्रज्ञायुक्त व्यक्ति क्या देखता है? ॥१३॥


अंतस्त्यक्तकषायस्य निर्द्वन्द्वस्य निराशिषः।

यदृच्छयागतो भोगो न दुःखाय न तुष्टये॥३- १४॥


विषयों की आतंरिक आसक्ति का त्याग करने वाले, संदेह से परे, बिना किसी इच्छा वाले व्यक्ति को  स्वतः आने वाले भोग न दुखी कर सकते है और न सुखी ॥१४॥



धन्यवाद 

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